यिर्मयाह 26:5 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

और न मेरे दास भविष्यद्वक्ताओं के वचनों पर कान लगाओ, (जिन्हें मैं तुम्हारे पास बड़ा यत्न करके भेजता आया हूँ, परन्तु तुमने उनकी नहीं सुनी),

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यिर्मयाह 26:5 पद-दर-पद बाइबल टीका

यिर्मयाह 26:5 का अर्थ

यह वाक्य कहता है कि लोग भविष्यद्वक्ताओं के वचनों पर कान नहीं रखते, जो परमेश्वर ने भेजे थे। नयाय के समय में वे संदेश कठिनाई और खतरे से भरे थे, फिर भी लोगों ने उन्हें अनसुना किया। सार में: परमेश्वर की ओर से भेजे गए दास—that is, अधिकारी-उपदेष्टा—के सुझावों पर मुलाक़ात न मानना समाज के पतन का कारण बनता है।

पश्चिमी संदर्भ-पृष्ठभूमि

यिर्मयाह का समय यरूशलेम के हुकूमतों के अंतर्निहित राजनीतिक तनाव का था। नबियों को बुलाया जाता है कि वे परमेश्वर के आदेश और चेतावनियाँ लोगों तक पहुँचाएं, लेकर लोग अक्सर सत्ता के भय, आत्म-स्वार्थ और पाखंड के कारण उन्हें अस्वीकार कर देते थे। यह वचन उसी ढलान की ओर इशारा है जब लोग नबियों के संदेश को तबाही के डर से टक्कर खाते हैं और सत्ता-व्यवस्था के विरुद्ध बोलने वालों को अस्वीकार करते हैं।

व्याख्यात्मक बिंदु

  • उत्पत्ति का कारण: नबियों के संदेश लोगों की हृदय-ईमानदारी की कमी के कारण नहीं सुने जाते।
  • रूप-राग: वचनों में चेतावनी, सुधार और परमेश्वर की व्यवस्था के पालन की माँग है।
  • मानवीय प्रतिरोध: दूसरों के सामने खड़े होना और गलत राह को छोड़ने के लिए प्रेरित होना आसान नहीं रहता।

छोटी थीमैटिक सूची

  1. कान लगाना बनाम बहस छोड़ना: केवल सुनना नहीं, ध्यानपूर्वक मानना जरूरी है।
  2. भरोसा बनाम अविश्वास: दास भविष्यद्वक्ताओं के वचन पर भरोसा परमेश्वर के आदेश को मानना है।
  3. नतीजा की चेतावनी: अगर लोग नहीं सुनते, तो परिणामस्वरूप संकट अधिक गहरा होता है।

संदर्भित पार्श्व-आइडियाज़ (Cross-References)

1) यिर्मयाह 7:27 — नबियों के संदेश को अस्वीकार करने की प्रक्रिया का आलोचनात्मक चित्रण। इस संदर्भ से समझ आता है कि उनका अस्वीकारना एक राष्ट्रीय असफलता का भाग है।

2) मत्ती 23:37 — यीशु का शहर के नेताओं के प्रति रोना, जहाँ वे भविष्यद्वक्ताओं के संदेश नहीं सुनते। यह दिखाता है कि पुरावतन संदेशों की अवहेलना कितनी गंभीर है।

3) हब्रोल 3:7-8 — चेतावनियाँ समय-समय पर नबियों के माध्यम से आईं, और लोगों ने उन्हें टाला नहीं, बल्कि फिर से गवाही के लिए बाँध दिया गया।

शब्द-सार और व्यावहारिक निष्कर्ष

जो भी परमेश्वर के दासों के वचनों पर कान नहीं लगाते, वे एक बार फिर ध्वस्त होने के रास्ते पर चलते हैं। यह संदेश हमें याद दिलाता है कि ईमानदार निरीक्षण, प्रेरित मार्गदर्शन और आत्म-आत्मीयता से बर्ताव करना चाहिए। यदि हम भी समय-समय पर सत्य के सच को ऊंचा रखें और आत्म-उद्धार हेतु सही सूचना पर ग़ौर करें, तो जीवन में स्थिरता मिलेगी।

संक्षेप में: निष्कासन से बचने के लिए दास भविष्यद्वक्ताओं के वचनों को न सिर्फ सुना जाए, बल्कि उन पर आचरण किया जाए—यह परमेश्वर के साथ सच्चे संवाद का भाग है।

संदर्भ-उद्धरण (जरूरी उद्धरण): यदि आवश्यकता हो तो Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक-डायरेक्ट विचारों के छोटे-कट उद्धरणों को शामिल किया जा सकता है; किन्तु यहाँ मूल सार सीधे पाठ से लिया गया है और उद्धरणों के पूर्ण टेक्स्ट नहीं दिए गए हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यिर्मयाह 26:5 समानांतर पद और संबंधित वचन

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“आमोन के पुत्र यहूदा के राजा योशिय्याह के राज्य के तेरहवें वर्ष से लेकर आज के दिन तक अर्थात् तेईस वर्ष से यहोवा का वचन मेरे पास पहुँचता आया है; और मैं उसे बड़े यत्न के साथ तुम से कहता आया हूँ; परन्तु तुमने उसे नहीं सुना।

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अब यहोवा की यह वाणी है, कि तुम जो ये सब काम करते आए हो, और यद्यपि मैं तुम से बड़े यत्न से बातें करता रहा हूँ, तो भी तुमने नहीं सुना, और तुम्हें बुलाता आया परन्तु तुम नहीं बोले,

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क्योंकि जिस समय से मैं तुम्हारे पुरखाओं को मिस्र देश से छुड़ा ले आया तब से आज के दिन तक उनको दृढ़ता से चिताता आया हूँ, मेरी बात सुनों।

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