यिर्मयाह 25:3 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

“आमोन के पुत्र यहूदा के राजा योशिय्याह के राज्य के तेरहवें वर्ष से लेकर आज के दिन तक अर्थात् तेईस वर्ष से यहोवा का वचन मेरे पास पहुँचता आया है; और मैं उसे बड़े यत्न के साथ तुम से कहता आया हूँ; परन्तु तुमने उसे नहीं सुना।

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यिर्मयाह 25:3 पद-दर-पद बाइबल टीका

मुख्य व्याख्या बिंदु

यिर्मयाह 25:3 में भविष्यसूचक संदेश एक व्यवस्थित इतिहास के दौरान बार-बार दोहराए जाने वाले निष्कर्ष की ओर इशारा करता है: यहोवा का वचन धीरे-धीरे, निरंतर और बड़े धैर्य के साथ आता रहा है, परन्तु परमादेशों के अनुरोध के बावजूद लोगों ने उसे नहीं सुना। यह पद यह दिखाता है कि मूसा, यहूदा के राजा योशिय्याह के शासन के साथ-साथ प्रारब्ध की एक दृढ़ प्रक्रिया के अंतर्गत, पवित्र भविष्यवाणी की आवाज़ कैसे उपेक्षित होती रही—और उसका परिणाम संस्थागत अवज्ञा के रूप में सामने आता है।

पाठ के साहित्यिक संदर्भ

लेखक यिर्मयाह ने इस अभिलेख में एक काल-युग (from the thirteenth year of योशिय्याह till the present day) बनाकर दिखाया है कि नबियों का संदेश एक सतत गतिशीलता में आता रहा, लेकिन प्रमुखता से यहूदियों के कान-जोई नहीं सुना गया। यह दृश्य, एक तरफ ईश्वर की क्रिया-प्रणाली को दर्शाता है, दूसरी तरफ मानव-अविनय की लाचारी को उजागर करता है।

धार्मिक महत्व

यह verses यह सिखाता है कि ईश्वर का वचन एक दृढ़ संकल्प के साथ आ रहा है, और उसका पालन न करने से समुदाय पर प्रभाव पड़ता है। नबी की आवाज़ आयी, परन्तु लोगों ने उसे ठुकरा दिया। यह हमारे लिए भी एक चेतावनी है कि हम ईश्वर की बातों को क्रमबद्ध और विवेकपूर्वक सुनें, और उनके अनुसार आचरण करें।

आध्यात्मिक सार और संरचना

1) सतत संदेशन: यहोवा का वचन समय के साथ आता रहा—तूम्हारे इतिहास में कहा गया है कि यह समय-रेखा बना रहा। 2) अवज्ञा की प्रतिक्रिया: सुनना न होना, और परिणामस्वरूप आघातभरी न्याय-व्यवस्था। 3) धैर्यपूर्ण चेतावनी: भविष्यवक्ताओं की आवाज़ कितनी बार आयी परन्तु निष्कर्ष वही रहा—यही संदेश का गहरा तनाव है।

क्रॉस-विचार: परस्पर-संबंध

  • यिर्मयाह 7–10 के संदेश: नैतिक विक्षेप और अनास्था पर चेतावनी। यह प्रकरण उसी प्रवृत्ति की पुष्टि करता है कि लोग पवित्र वचनों को अनदेखा करते हैं।
  • यिर्मयाह 26–29: नबियों के विरोधाभास और दंडात्मक परिणाम। यह बताता है कि परमेश्वर के वचनों को मानना जीवन में कितना आवश्यक है।
  • यशायाह 55:11: God's word accomplishes its purpose—यहां भी वचन की प्रभावशीलता और सुनने की आवश्यकता पर बल देता है।

विचारण के प्रश्न

  • आप अपने जीवन में किस प्रकार ईश्वर के वचनों को सुनते या टालते हैं?
  • जो संदेश समय के साथ आता रहे, उससे हमारी आस्था में कौन से परिवर्तन आते हैं?
  • क्या आप वास्तविक विवेक के साथ बाइबल के स्पष्ट आह्वानों को मानते हैं?

निगम-निष्कर्ष

यिर्मयाह 25:3 का यह कथन हमें बताता है कि ईश्वर का वचन निरंतर और बढ़ता हुआ आता है; परन्तु मानव का उत्तर-देना-या अवज्ञा ही इतिहास की दिशा तय करती है। सही अर्थ में, यह एक आंतरिक चेतावनी है कि हम अपने समयानुसार वचन को ग्रहण करें और उसकी पाथ-प्रेरणा के अनुसार जीवन की दिशा निर्धारित करें।

अनुदेशक उद्धरण (प्रयोजन-संदर्भ)

शास्त्रीय टिप्पणीकारों के सामान्य विचारों के साथ संक्षिप्त सुसंगत निष्कर्ष देखें: यह पद नबी की आवाज़ के लगातार आने और मानव प्रतिक्रिया के संदर्भ में है—यही कारण है कि नबियों की चेतावनियाँ समय-समय पर प्रस्तुत होती आयी हैं।

संक्षिप्त संदर्भ-क्रॉस

यिर्मयाह 7–10; यिर्मयाह 26–29; यशायाह 55:11

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यिर्मयाह 25:3 समानांतर पद और संबंधित वचन

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क्योंकि जिस समय से मैं तुम्हारे पुरखाओं को मिस्र देश से छुड़ा ले आया तब से आज के दिन तक उनको दृढ़ता से चिताता आया हूँ, मेरी बात सुनों।

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यहोवा का वचन उसके पास आमोन के पुत्र यहूदा के राजा योशिय्याह के दिनों में उसके राज्य के तेरहवें वर्ष में पहुँचा।

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अब यहोवा की यह वाणी है, कि तुम जो ये सब काम करते आए हो, और यद्यपि मैं तुम से बड़े यत्न से बातें करता रहा हूँ, तो भी तुमने नहीं सुना, और तुम्हें बुलाता आया परन्तु तुम नहीं बोले,

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