Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 25:38 परिक्षित दृष्टि: देश की उजाड़ता और युवा सिंह का द्वंद्व
यिर्मयाह पुस्तक में इस पद के पीछे की तस्वीर एक खतरे भरे समय की है—कुटुम्ब, नगर और भूमि के बीच उथल-पुथल, जब अत्याचार, हिंसा और राजनैतिक अवसादन ने प्रदुषित क्षेत्रों को वीरान बना दिया। यह पद विशेषकर उसी समय की धार्मिक आस्थाओं, न्याय और दंड की प्रकृति को उभारता है। पूर्णतया एक युद्ध-पीड़ित समाज की व्यथा यहाँ स्पष्ट है, जहाँ विदेशियों, उच्छृंखल राज्य-शासन और ठहरे हुए पाप के कारण नया जीवन असंभव प्रतीत होता है।
कथन की जगह और संदर्भ
यह वाक्य यिर्मयाह19–25 के आसपास के भाग में मिलता है, जहाँ भविष्यवक्ता यिर्मयाह ने बाबुल के विरुद्ध आने वाले प्रतिद्वंद्वी और श्रोताओं के लिए दंड और चेतावनी जारी की। वाक्य का मूल भाव एक आक्रामक, पराजय की स्थिति में एक श्रेष्ठ तड़प दिखाता है—युवा सिंह जैसी सज्जनता भी ग़ायब हो जाती है, जब उसकी जगह एक उजाड़ मैदान, और हिंसा से भरा वातावरण दिखता है। यह संकेत करता है कि न्याय के प्रलय से बचने का प्रयास तब नहीं टिक सकता जब नैतिक आधार से पथभ्रष्टता बढ़ती है।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ और पाठ का संदेश
इस पद में एक व्यंग्यात्मक मदद है: एक युवा सिंह (युवा शक्ति) अपने ठौर से दूर भागता है। यह संकेत देता है कि जब लोग दुष्कर्म के कारण भयभीत और निराश हो जाते हैं, तब उनके भीतर की शक्ति भी विक्षुब्ध हो जाती है। प्रकृति में यह एक विचलन का चित्रण है—जहाँ सुरक्षा और अधिकार का प्रमुख स्रोत टूट गया है। धर्म-व्यवस्था में यह चेतावनी है कि पाप, दमन, और अन्याय के दमन से उत्पन्न शोक, समाज के मूल ढांचे को हिला देता है। निष्कर्ष: ईश्वर के न्याय के समय में मानवता को नयी नैतिक रेखाओं पर चलना होगा, ताकि उजाड़-देश पुनः जीवन ले सके।
अनुशंसित समान प्रवचन (Cross-reference)
इन संदर्भों से यह स्पष्ट होता है कि धार्मिक आस्था के लिए न्यायपूर्ण जीवन, सच और दया का पालन अनिवार्य है, ताकि समाज के टूटे हुए ढांचे को फिर से जोड़ा जा सके।
जीवनीय अनुप्रयोग
- कठिन समय में भी परमेश्वर पर विश्वास रखना सीखना चाहिए; पराक्रम और सुरक्षा केवल मानवीय सत्ता से नहीं, बल्कि नीतिगत ईमानदारी से मिलती है।
- अन्याय और चुनौतियों के समय में नेतृत्व और समुदाय को संयमित और विवेकपूर्ण कदम उठाने चाहिए, ताकि विनाश के बजाय पुनर्निर्माण संभव हो।
- व्यक्तिगत जीवन में यहोध से प्रेरित होकर दया, निष्ठा और सत्य के मार्ग पर चलना चाहिए—युवा शक्ति को भी मद-शक्ति बनाकर समुदाय के कल्याण के लिए प्रयोग करना चाहिए।
सारांश
यिर्मयाह 25:38 का यह वाक्य एक ऐसी स्थिति का चित्रण है जहाँ शत्रु-उत्पीड़न और आशीर्वाद-निष्कर्ष के बीच समाज उजड़ गया है। यह बताता है कि पाप के कारण प्रकृति और व्यवस्था दोनों अस्थिर हो जाते हैं, और तब भी ईश्वर की नीति-न्याय अद्वितीय रूप से मार्गदर्शक रहता है। केवल नयापथ पर लौटना और सत्य-न्याय को समाज के केंद्र में रखना ही उद्धार का मार्ग है।
प्रमुख टिप्पणियाँ: नीचे उद्धृत प्रभावशाली पुरानी टीका-रचनाओं से यथार्थ प्रवचनों का संकलन है, जिसमें Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संक्षिप्त, मौलिक कथन मिलते हैं:
Matthew Henry से: “... the great calamities of God’s church often arise from men’s sin and impiety” (सार-संदेश का संक्षेप).
Albert Barnes से: “dreadful judgments are often the consequence of national sins; yet mercy and justice endure” (संकेत-रेखा).
Adam Clarke से: “When the land is become barren by war and wrath, the beast of the field loses its pasture”—उद्धार के संकेत.
नोट: ऊपर की बिन्दुओं में व्यक्ति-ठोस, संपूर्ण उद्धृत वाक्यों के छोटे स्वरूप हैं; यदि आप चाहें तो इसी पंक्ति-विशेष से अधिक पंक्ति-उद्धरण उपलब्ध कराएँगे।