Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 25:15 — संदर्भ और संदेश
यिर्मयाह को अब्दोधन की स्थिति में परमेश्वर यहोवा अपने संदेशवाहक के रूप में भेजते हैं: एक जलजलाहट के दाखमधु का कटोरा लेकर यरूशलेम के बाहर से लेकर सब जातियों के पास भेजना। यह कटोरा संकेतक है—यह Θεோம் के समय की कठोर दंडात्मक निर्णयन का प्रतीक है। संदर्भ में यह यह दर्शाता है कि यह दण्ड केवल इज़्राइल पर नहीं, बल्कि उन सभी राष्ट्रों पर भी है जिन्हें परमेश्वर ने यिर्मयाह के हाथों भेजा है।
मुख्य उद्देश्य और केंद्रीय अर्थ
यह verse परमेश्वर की क्रोध और न्याय की गहरी वास्तविकता को चित्रित करता है। प्रभु कह रहे हैं कि उनके हाथ से लिया गया यह कटोरा उन सब जातियों को दिया जाएगा जिन्हें वे चुनते हैं—ताकि वे उनके आशीष से अविनाशी हो जाएं, परंतु जिस दिन वे पिलेंगे, उस दिन उनका आह्वान होगा। यह संकेत है कि दण्ड से बचना नहीं, बल्कि परमेश्वर के निर्णय के सामने Submission और पश्चाताप आवश्यक है।
तीन प्रमुख विषय
संबद्ध कथन और क्रॉस-रेफरेंसेस
यहाँ के चित्रण की दिशा अधिक स्पष्ट होती है जब हम प्रकरण में बताए गए अन्य संकेतों पर दृष्टि डालते हैं:
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि न्याय के साथ-साथ परमेश्वर का कोमलता और उद्धार की योजना भी चलते रहती है।
व्यावहारिक आशय
हम यहाँ से एक अभ्यास लेते हैं: परमेश्वर के न्याय से डर कर पथ से भटकना छोड़ दें, और उसकी पवित्रता के अनुरूप जीवन जीएँ। दूसरे शब्दों में, कठिन चेतावनियाँ चुनौतीयों का संकेत होती हैं कि हम अपनी दिशा बदलें और ईमानदारी से दया, क्षमा और भक्तिपूर्ण आचरण अपनाएं।
संक्षेप
यिर्मयाह 25:15 में परमेश्वर यह स्पष्ट करते हैं कि कटोरा—दाखमधु का संकेत—सभी राष्ट्रों के लिए दण्ड के कारण है, ताकि वे अपने रास्ते सुधारें और परमेश्वर के न्याय के सामने स्वीकार करें। यह संदेश आज भी स्मरणीय है: परमेश्वर का निर्णय सार्वभौमिक है, पर उद्धार का रास्ता न्याय और अनुकंपा के साथ खुला रहता है।
नोट्स और उद्धरण
इस पंक्ति से Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के पुराने प्रायोगिक विवेचनों के संक्षिप्त संकेत मिलते हैं—क्योंकि वे इस दृश्य में न्याय, दयालुता और पृथ्वी के राष्ट्रों के लिए परमेश्वर की योजना को गहराई से समझाते हैं।
सूचीबद्ध उद्धरणों की स्थिति: यदि बिल्कुल उद्धृत वाक्य मिलें, वे केवल पहचान योग्य छोटे अंश होंगें जैसे ऊपर दर्शाए गए संदेशों में—कृपया ध्यान रखें कि पूर्ण वाक्यों के उद्धरण नहीं दिए गए हैं।