यिर्मयाह 25:37 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

और यहोवा के क्रोध भड़कने के कारण शान्ति के स्थान नष्ट हो जाएँगे, जिन वासस्थानों में अब शान्ति है, वे नष्ट हो जाएँगे।

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यिर्मयाह 25:37 पद-दर-पद बाइबल टीका

यिर्मयाह 25:37 का स्पष्ट अर्थ

यह verse यह बताता है कि परमेश्वर के क्रोध के कारण शान्ति के स्थान, जहाँ अब शान्ति है, विनष्ट हो जाएँगे। जमीन पर ज़रूरत पड़ने पर भी, उसकी न्याय-योजना से छिपना संभव नहीं है; जहाँ लोग शान्ति मानते हैं, वहाँ भी विनाश आ सकता है जब प्रभु का क्रोध जाग जाए।

संदर्भ पृष्ठभूमि

यिर्मयाह नबीयुग के अंत के पूर्व के समय की रिपोर्ट है, जब युक्तियों और अविश्वास के कारण यहूदी समाज अस्थिर था, और ईश्वर की judged चेतावनी के बावजूद लोग पथसेल हो रहे थे। इस वचन में यह दिखाया गया है कि शहर-शहर, मंदिर-घरों, और पवित्र स्थानों के भीतर भी असुरक्षा का संकट आ सकता है यदि ईश्वर के क्रोध को टाला नहीं गया।

व्याख्यात्मक बिंदु

  • शान्ति के स्थानों की विध्वंस: जहाँ लोग शांति की आशा करते हैं, वहाँ क्रोध के कारण विनाश संभव है—मानव-योजना कभी-कभी परमेश्वर की योजना के सामने असहाय हो जाती है।
  • दैवी न्याय की अनुपम स्वाभाविकता: यहूदियों के लिए यह स्मरणीय है कि पवित्र स्थान भी ईश्वर के न्याय से सुरक्षित नहीं रह सकता जब लोग पाप में डूब जाते हैं।
  • निरंतरता बनाम परिवर्तन: पूर्वों में भी शान्ति के स्थानों का नष्ट होना यह संकेत है कि स्थायी सुरक्षा केवल परमोधर्म से प्राप्त होती है, न कि केवल भू-धारणाओं से।

संदर्भित विभाजन और छोटे पाठ

यह अंश यिर्मयाह की स्मरण-क्रिया को पुष्ट करते हैं कि भगवान के क्रोध के समय दुनिया की शान्तियाँ अस्थिर हो जाती हैं।

संदर्भित प्रमुख प्रवचनों से मिलान

Matthew Henry और Adam Clarke आदि के संकलनों में इसी प्रकार के विचार मिलते हैं: शान्ति-स्थलों की भंगिमा तब आती है जब लोग परमेश्वर के अधिकार से विच्छेद कर लेते हैं; न्याय और दया की सही भावना बनाए रखना अनिवार्य है। नीचे छोटे उद्धरणों की यादें हैं:

“जहाँ लोग शान्ति मानते हैं, वहाँ भी ईश्वर की ज़रूरत है कि वह अपने क्रोध को रोक ले, परन्तु अगर पाप बढ़ता है, तो न्याय अनिवार्य हो जाता है।” (कथनात्मक सार)

क्रॉस-रेफरेंसेज़

1) यिर्मयाह 6:14 — शान्ति के स्थानों पर अपेक्षित उपचार मिलना मुश्किल हो जाता है जब लोग पाप में डूब जाते हैं।

2) यिर्मयाह 30:18 — उद्धार और पुनर्निर्माण की योजना तब ही संभव है जब परमेश्वर के न्याय के साथ उनकी कृपा भी शामिल हो।

3) यिर्मयाह 51:29 — बड़े नगरों के विनाश का संकेत तब आता है जब परमेश्वर का क्रोध बढ़ता है।

इन संदर्भों का उद्देश्य यह दिखाना है कि केन्द्रीय प्रश्न शान्ति की स्थायित्वता नहीं, बल्कि परमेश्वर की न्याय-योजना के अनुरूप धार्मिक पुनरुत्थान है।

संक्षिप्त व्यावहारिक निष्कर्ष

हम कहते हैं: जब भी हमारे सामाजिक या धार्मिक स्थानों में शान्ति प्रतीत हो, हमें आत्म-निरिक्षण करना चाहिए कि क्या हम परमेश्वर के मार्ग से विचलन तो नहीं कर रहे। परमेश्वर की निर्दोषता और न्याय के सम्मान में अपनी आस्थाओं को सदा जागृत रखना चाहिए—यही वास्तविक सुरक्षा है।

मुख्य निष्कर्ष

यिर्मयाह 25:37 हमें याद दिलाता है कि किसी भी सुरक्षित-स्थान की गर्मजोशी तब तक स्थिर नहीं रहती जब तक आत्म-निरपेक्ष पाप और अविश्वास कायम रहते हैं। केवल परमेश्वर के क्रोध के समय के बाद भी उसकी करुणा और न्याय से उद्धार संभव है, अगर हम पलटकर उसके मार्ग पर चलें।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यिर्मयाह 25:37 समानांतर पद और संबंधित वचन

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