Old Testament
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यिर्मयाह 33:2 – संदर्भ के साथ व्याख्या
यिर्मयाह नबी के युग में यह वाक्य एक ऐसी स्थिति का संदेशन करता है जहाँ परमेश्वर अपने चरम अधिकार और सच्चे स्वामित्व की याद दिलाते हैं। जब यरूबालाम, बन्धन और दुर्बलता के बीच यहूदियों को भय और अस्थिरता ने घेर रखा था, तब ईश्वर ने अपने नाम से संबोधित करते हुए आश्वस्त किया कि वही धरती की रचना करने वाला है और उसे स्थिर रखने वाला भी है। यह वाक्य परमेश्वर के नाम “यहोवा” के साथ उनकी विश्वसनीय सत्ता एवं संरक्षण को उजागर करता है।
केंद्रीय अर्थ
इस वाक्य में “यहोवा जो पृथ्वी का रचनेवाला है, जो उसको स्थिर करता है, उसका नाम यहोवा है” का तात्पर्य यह है कि परमेश्वर न केवल सृष्टि की संहारक हैं, बल्कि उसे बनाए रखने वाले और कल्याण के निर्णायक हैं। उनका नाम भरोसे का आधार है; उसकी सत्ता स्थिर है, चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों।
मुख्य विचार (तीन विषय)
संबंधित उद्धरण (Cross-references)
1) यिर्मयाह 32:27 – परमेश्वर अपने लोगों के लिए कर्मकांड नहीं, बल्कि उनकी नियति के रचयिता के रूप में चिह्नित है। यह दिखाता है कि उनके दिल में भरोसा क्यों उठता है कि सब कुछ उनके नियंत्रण में है।
2) उतपन्न 1:1–2 – संसार के आरम्भ में परमेश्वर की सृष्टि और उसकी सत्ता का उद्घोष, जो वही स्थिर करने वाले हैं, पर बल देता है।
3) भजन 46:11 – परमेश्वर के राज्य में शांति और स्थिरता; कोई भी उथल-पुथल हो, उसका नाम और उसकी सत्ता अडिग रहती है।
व्यावहारिक विचार
- कठिनाइयों के बीच भी अपने जीवन की योजना परमेश्वर के हाथों में मानना सीखें।
- भय और अनिश्चितता की घड़ियों में भी प्रभु के नाम पर टिके रहें; वह भरोसेमंद है और स्थिति चाहे कैसे भी दिखे, वह इसे नियंत्रित करते हैं।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 33:2 बताता है कि परमेश्वर वही है जो सभी चीजों का रचयिता और उन्हें बनाए रखने वाला है। उसका नाम ही आश्रय-विश्वास का आधार है। संकटकालों में भी यह तथ्य स्मरण रखना चाहिए कि पृथ्वी-ग्लोबल योजना उसी के नियंत्रण में है और उसका उद्देश्य अपनी पवित्र नीयत के अनुरूप पूरा होगा।
नोट्स: पूर्व टिप्पणीकारों के संकेत
कई प्राचीन विद्वानों ने इस Verse के उद्देश्य को उस आधुनिक विश्वास-विश्वास के साथ जोड़ा है कि परमेश्वर की सृष्टिकर्ता और संरक्षक सत्ता दोनों एक ही देह-स्वरूप हैं।