Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
यिर्मयाह 33:1 यिर्मयाह 33:2 यिर्मयाह 33:3 यिर्मयाह 33:4 यिर्मयाह 33:5 यिर्मयाह 33:6 यिर्मयाह 33:7 यिर्मयाह 33:8 यिर्मयाह 33:9 यिर्मयाह 33:10 यिर्मयाह 33:11 यिर्मयाह 33:12 यिर्मयाह 33:13 यिर्मयाह 33:14 यिर्मयाह 33:15 यिर्मयाह 33:16 यिर्मयाह 33:17 यिर्मयाह 33:18 यिर्मयाह 33:19 यिर्मयाह 33:20 यिर्मयाह 33:21 यिर्मयाह 33:22 यिर्मयाह 33:23 यिर्मयाह 33:24 यिर्मयाह 33:25 यिर्मयाह 33:26



यिर्मयाह 33:5 का शाब्दिक पाठ और उसका गहरा अर्थ
कसदियों से युद्ध करने को वे लोग आते हैं, परन्तु मैं क्रोध और जलजलाहट में आकर उनको मरवाऊँगा और उनकी लोथें उसी स्थान में भर दूँगा; क्योंकि उनकी दुष्टता के कारण मैंने इस नगर से मुख फेर लिया है।
मुख्य interpretive point: परमेश्वर की यह चेतावनी एक ऐसी परिस्थिति को दर्शाती है जहाँ प्रतिशोध और न्याय दोनों एक साथ दिखते हैं—नुकसान पहुँचाने वाले शक्तियाँ यहाँ तक कि भीतर से टूटे हुए शहर पर भी शासन करती हैं, परन्तु परमेश्वर का उद्देश्य अपराध के परिणामस्वरूप क्रोध के साथ भी उन्नति, सुधार और फिर से उद्धार है। यिर्मयाह के संदर्भ में यह शास्त्र न सिर्फ दंड का तंत्र है, बल्कि परमेश्वर की दयालु योजना की भूमिका और लोगों को उनकी अविश्वासिता से लौटाने की पुकार भी है।
साहित्यिक प्रसंग और संरचना
यिर्मयाह 33 हरान-हालात में भी भविष्य के आश्वासन की गूंज देता है। यहाँ नगर पर आक्रमण की भयावहता, दुष्टता की बात और फिर भी ईश्वरीय संकल्प दिखते हैं—“लोथें भर दूँगा” जैसे कठोर शब्दों के माध्यम से न्याय की निश्चितता उजागर होती है। यह भाग कड़वी सच्चाई पर भी परमेश्वर के नियंत्रण को रेखांकित करता है: भले ही लोग प्रभु से मुख मोड़ लें, वह अपने उद्देश्य को अंत तक पूरा करते हैं।
धर्मशास्त्रीय महत्व
इस आयत में न्याय और दया का संतुलन स्पष्ट है। परमेश्वर अपना क्रोध उबलते जल की तरह दिखाते हैं, परन्तु वे एक ऐसी पनाह भी बनते हैं जहाँ फिर से व्यवस्था, संयम और उद्धार मिल सके। यह उद्धार आशा एक बार फिर से भविष्य में देश-जन की पुनर्स्थापना की ओर इशारा करता है।
अनुसंगति के बिंदु
Cross-references (संकेतित संबंध) और संक्षेप व्याख्या
1) इतिहास में असफल शहरों का न्याय (प्रेरित नहीं) —ांतरिक संकेत: जब देश-जन अपने पाप से दूर नहीं होते, तो परमेश्वर सचेत करते हैं और दंड देकर सुधार की दिशा दिखाते हैं।
2) पुनःस्थापना की आशा (यिर्मयाह की अगली दृष्टि) — परमेश्वर भविष्य में मरम्मत और पुनःस्थापना का मार्ग खोलते हैं, जहाँ क्रोध के पश्चात विश्वास और राजा का राज्य उभरता है।
3) दया और न्याय का संगम — न्योंचित न्याय के साथ परमेश्वर की दयालुता भी काम करती है, ताकि लोग टूट-फूट से उठ कर पथ पर लौट आएं।
reflection questions (विचार हेतु प्रश्न)
निष्कर्ष
यिर्मयाह 33:5 हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर के न्याय के साथ-साथ उसकी उद्धार की योजना भी निरंतर काम करती है। कठिनाई के समय डरना उचित है, परन्तु विश्वास रखें कि परमेश्वर के निर्णय स्वच्छ और लक्ष्य-सम्बन्धी हैं—दुष्टों के लिए दंड के साथ-साथ फिर से विश्वास और आध्यात्मिक पुनर्निर्माण का मार्ग भी खुला है।
महत्वपूर्ण उद्धरण (दोनों प्रसिद्ध पवित्र-वचन commentaries से क्रमशः, यदि उपलब्ध): - Matthew Henry: “...” - Albert Barnes: “...” - Adam Clarke: “...” नोट: ऊपर के उद्धरण केवल संकेत के रूप में हैं; पूर्ण पाठ को यहाँ उद्धृत नहीं किया गया है ताकि मूल भाव सुरक्षित रहे।