Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
यिर्मयाह 37:1 यिर्मयाह 37:2 यिर्मयाह 37:3 यिर्मयाह 37:4 यिर्मयाह 37:5 यिर्मयाह 37:6 यिर्मयाह 37:7 यिर्मयाह 37:8 यिर्मयाह 37:9 यिर्मयाह 37:10 यिर्मयाह 37:11 यिर्मयाह 37:12 यिर्मयाह 37:13 यिर्मयाह 37:14 यिर्मयाह 37:15 यिर्मयाह 37:16 यिर्मयाह 37:17 यिर्मयाह 37:18 यिर्मयाह 37:19 यिर्मयाह 37:20 यिर्मयाह 37:21



यिर्मयाह 37:5 पर एक समेकित टिप्पणी
कथा-भूमिका: इस युडीय भाग में यिर्मयाह भविष्यवक्ता के शब्दों के बीच असली जीवन की घटनाओं की संगत दिखती है। फ़िरौन की सेना मिस्र से उठती है और शहर-युद्ध की हलचल बढ़ती है, जबकि कसदी जो यरूशलेम को घेरे थे, वे घटना के समाचार पाकर पीछे हट जाते हैं। यह घटना निष्कर्ष नहीं, बल्कि मार्गदर्शन का स्पर्श है कि मानवीय योजनाएँ और दांव क्या-क्या मोड़ लेते हैं जब परमेश्वर के समय-निर्धारण के विपरीत आयोजन होते हैं।
पद का पाठ्य विश्लेषण
“उस समय फ़िरौन की सेना चढ़ाई के लिये मिस्र से निकली; तब कसदी जो यरूशलेम को घेरे हुए थे, उसका समाचार सुनकर यरूशलेम के पास से चले गए।”
यह एक बाहरी राजनीतिक घटनाक्रम का उल्लेख है जो यरूशलेम की सुरक्षा-स्थिति को प्रभावित करता है। मिस्र की सेनाओं का उठना दर्शाता है कि क्षेत्रीय सत्ता-परिवर्तन तेजी से हो सकता है, परन्तु प्रभु की योजनाओं के संदर्भ में यह सब एक निर्धारित मार्ग की ओर संकेत करता है।
चैप्टर संदर्भ और मुख्य संदेश
यिर्मयाह का यह भाग जटिल राजनीतिक हालात के बीच परमेश्वर के संदेशवाहक की स्थिरता पर केन्द्रित है। यिर्मयाह को संदेश मिलते रहते हैं कि बाहरी संकट कैसे आभासी समाधान बनाते हैं, जबकि परमेश्वर की दृष्टि में असली सुरक्षा उसकी वाणी और उसकी नीति के अनुरूप चलना है। इस verse में ज़रूरी पाठ: दुश्मन की चाल अचानक बदल सकती है, परन्तु ईश्वरीय निर्माण-कार्य का क्रम कभी अवरोधित नहीं होता।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
अनुस्वादन: अन्य पवित्र ग्रंथों के साथ तुलना
- यिर्मयाह 46–49 के कुछ भागों में मिस्र की राजनीति और क्षेत्रीय शक्तियों के बदलते स्वरूपों का संदर्भ मिलता है; इससे यह विचार पुष्ट होता है कि परमेश्वर अपने लोगों के लिए उचित समय पर मार्ग खोलते हैं, भले ही बारीकियाँ विपरीत लगें।
- यशायाह की कुछ भविष्यवाणियाँ भी ऐसे ही विश्व-राजनीतिक उलटफेरों के संकेत देती हैं, परन्तु परमेश्वर के विरुद्ध नहीं; वह अपने उद्देश्य को पूरा करते हैं।
अनुप्रयोग: आज के संदर्भ में
हम कभी-कभी जीवन की बड़ी चुनौतियों में देखते हैं कि दुश्मन अदला-बदली कर देता है, और हम असुरक्षित होने लगते हैं। इस verse से सीख: संतोष और धैर्य के साथ परमेश्वर के समय-निर्धारण को स्वीकारना चाहिए। अपनी योजनाओं को प्रभु के मार्गपर चलने की योजना से समायोजित करना एक बुद्धिमान उत्तर है।
क्रॉस-रेफरेंस और छोटा टिप्पणी
- यिर्मयाह 33:3 — परमेश्वर की सलाह और मार्गदर्शन समय पर मिलते हैं।
संक्षेप में यह संकेत देता है कि बाहरी घटनाओं पर अति- निर्भरता न करके, आत्मा-लाग्ना और परमेश्वर की दिशा में स्थिर रहना चाहिए।
व्यावहारिक स्मरणीय बिंदु
स्पष्ट सार: इस वाक्य में बाहरी शक्तियाँ हलचल दिखाती हैं, पर परमेश्वर के उद्देश्य के सामने वे एक क्रम बनाती हैं। हमारा उत्तर है विश्वास, छोटे-छोटे निर्णयों में भी ईश्वर के निर्देशों के अनुरूप चलना।
महत्वपूर्ण उद्धरण (प्लैटफॉर्म पर उपलब्ध पवित्र-उद्धरण):
“यिर्मयाह 37:5” को विशिष्ट रूप से संदर्भित करते समय नीचे दिए गए समानार्थी उद्धरण सामान्य पाठ के लिए उपयोगी रहते हैं; किन्तु पूर्ण साहित्यिक उद्धरण यहाँ संकलन के अनुरूप नहीं हैं।