Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52



यिर्मयाह 43:2 का तत्कालीन संदर्भ और अर्थ
इस पद में यिर्मयाह के प्रेषित होने पर आसपास के समर्थक-हटा कर दिखते हैं कि बंधन से बाहर निकलना कितना मुश्किल था। होशायाह पुत्र अजर्याह, कारेह पुत्र योहानान और और कुछ अभिमानी पुरुष यिर्मयाह से मिलकर कहते हैं कि वह "झूठ बोलता है" और परमेश्वर यहोवा ने उसे मिस्र में रहने के बारे में न भेजा था। वे अपनी दवा‑वरिष्ठता और भय से प्रेरित होकर मिस्र जाने के संदेश को अस्वीकार कर देते हैं। यह दृश्य हमें यह सूचित करता है कि वास्तविक विश्वास के मार्ग में अक्सर दैनंदिन भय, राजनीतिक दबाव और प्रशংসित निर्भरताएं बाधक बनती हैं।
ईश्वर और विश्वास का संदेश
यह पाठ दिखाता है कि पवित्र परमेश्वर ने भविष्यवक्ता के तौर पर Jeremiah को संदेश दिया है, भले उसे समूह के भीतर प्रतिरोध का सामना करना पड़े। जब लोग कहते हैं कि “तू झूठ बोलता है,” तब भी ईश्वर की योजना और सत्य प्रगट रहता है। यह संकेत करता है कि परमेश्वर अपने चेलों को साहस, विश्वास और धैर्य के साथ सत्य का उद्घाटन करने के लिए बुलाते हैं, भले ही परिणाम कितने ही कठिन क्यों न हों।
महत्त्वपूर्ण शब्द और चित्र
संबद्ध प्रवचनों के संकेत
हिंदी बाइबल में Jeremiah के संदेश अक्सर विपत्ति के समय भी ईश्वर की सुरक्षा और उपस्थित रहने की याद दिलाते हैं। - अन्य उद्धरणों के लिए देखें: मिस्र से निकलना और भविष्य के आदेशों के संयोजन पर विचार करें; ईश्वरीय आह्वान के पुकार के साथ विपरीत परिस्थितियों में दृढ़ रहने के उदाहरण।
आज के लिए अनुप्रयोग
हम किस प्रकार भय, राजनीति या सामाजिक दबाव में अपनी आस्था की आवाज दबाते हैं? यीशू के अनुयायियों के लिए यह एक स्मरण कराता है कि सत्य के मार्ग पर चलना कभी-कभी असुविधाजनक होता है, परन्तु ईश्वर के उद्देश्य प्रबल रहते हैं। आप अपने जीवन के निर्णयों में परमेश्वर के संदेश की पुष्टि करिए, भले ही वह अभी अस्पष्ट क्यों न हो। विश्वास के साथ साहस दिखाते हुए, अपने समुदाय में सत्य के कृती को आगे बढ़ाने का प्रयास करें।
क्रॉस-रेफरेंस और संक्षेप स्पष्टता
1) यिर्मयाह 42–43: समूह का फैलाव और मिस्र जाने के विचार की बहस; यह बताता है कि परमेश्वर के सलाहकारों में से कभी-कभी गलत मार्ग भी सुझे जाते हैं।
2) यशायाह 30:15: आत्म-शांति और निर्भरता के लिए परमेश्वर के निर्देश का महत्व; यदि हम चुप रहें और परमेश्वर पर निर्भर हों, तो शांति आयेगी।
3) प्रावर्त्तित हद तक, प्रेरितों के समय में भी खतरा और अस्वीकारिता दिखती है, पर परमेश्वर का संदेश स्थिर रहता है।
संक्षिप्त मौलिक सार
यिर्मयाह 43:2 एक ऐसे क्षण का चित्र है जहां विश्वास पर खड़े रहने के लिए साहस और धैर्य चाहिए। यह याद दिलाता है कि सत्य के साथ खड़े रहने पर भी समाज और नेताओं की आपत्ति आ सकती है, पर ईश्वर के मार्ग का पालन ही विश्वास का परीक्षण और विकास है।
नोट: इस पंक्ति के लिए Matthew Henry, Albert Barnes तथा Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों के विचारों से सपोर्टिंग संकेत संजोए गए हैं; नीचे इन्हीं संदर्भों के छोटे उद्धरण और उनके अर्थ शामिल हैं:
“...तू झूठ बोलता है” — यह वाक्य Jeremiah की सच्ची प्रेषित-गति की सत्यता की पुष्टि के विरुद्ध आसानी से उठने वाले आरोप का चित्रण है।
“यहोवा ने तुझे यह कहने के लिये नहीं भेजा” — यह संदेश की आधिकारिकता पर प्रश्न उठाने वाले आवाज़ों की चुनौती है; जो सत्य को ठहराने के लिए परमेश्वर के निर्देशों पर टिके रहते हैं।