Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52

यिर्मयह 43:13 का निचोड़: मिस्र के सूर्यगृह और देवालयों की கரा कर डालेगा
यिर्मयह 43:13 में भविष्यवक्ता दिखाता है कि बाबूल के उद्भव से प्रेरित पाप और अज्ञान के कारण यह्रूशालेम के बाद भी वे ईश्वर के विरुद्ध मिस्र के धार्मिक-स्थलों पर दंड लगाए जाएंगे। यह पाठ यह संकेत देता है कि ईश्वर की योजना में वे सारी वस्तुएँ जो लोगों ने अपनी सुरक्षा और उद्धार के लिए भरोसा मान ली थीं, वे परमेश्वर के विवेक के सामने अस्थिर साबित होंगी।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यिर्मयह नबी ने बंधनों के समय में यहूदियों को चेतावनी दी: मज़बूत राजनीतिक-धार्मिक ढाँचों पर निर्भर रहने से वे ईश्वर के संरक्षण से वंचित हो जाते हैं। 43章节 में लोग बाबुल से भागकर मिस्र जाते हैं, परन्तु जहाँ वे गलती से शांति मान लेते हैं, वहीं उनका ढंग भी ढहता है। यीशु के भविष्यवाणी-आधार पर मिस्र के सूर्यगृह (sun-god temples) और देवालयों को नष्ट करने का संकेत एक व्यापक विध्वंस का चित्र है—जो आत्मिक और सामाजिक बिखराव को दर्शाता है।
पूर्वदर्शी पाठ के मतलब ( Interpretive observations )
थीम-सूची
अन्य सम्बद्ध आयतें (Cross-references) और उनके संदर्भ
1) यिर्मयह 2:13—“उनके लिए दो हजार वस्त्र” जैसे जल-चर्चाओं के बजाय वे एक ही स्रोत पर टिके रहना सीखें: परमेश्वर ही वह ढांचा है जिसमें जीवन का ठहराव है।
2) यिर्मयह 50:2—मिस्र के संदर्भ में प्रचलित सुरक्षा-आशा की बोधगम्यता—ईश्वर की योजना के सामने प्रत्यक्ष अवरोध बना रही आशा पर प्रश्न।
3) दानियेल 2:44—आखिरकार सारी मानव-स्थापित सत्ता ईश्वर के राज्य के सामने वर्जित हो जाती है; यह verse परमेश्वर के मुख से निकलने वाले न्याय के उद्घोष को पुष्ट करता है।
इन संदर्भों में उल्लेखित संदेश यह है कि मानव-आस्था के स्थलों के बावजूद परमेश्वर का लक्ष्य और नियंत्रण सर्वोपरि है।
व्यावहारिक takeaway
हमारी सुरक्षा earthly systems पर नहीं बल्कि परमेश्वर की कृपा और विश्वास पर टिकी होनी चाहिए। जो चीजें मानव-निर्मित हैं, वे कभी-कभी अस्थायी और क्षणभंगुर होती हैं; पर जो ईश्वर के संरक्षण में है, वह अंत तक अটूट रहता है। आत्म-विश्वास बनाम ईश्वर-विश्वास में फर्क समझना जीवन के निर्णयों में मदद देता है: पृथ्वी-उद्धारों के बजाय परमेश्वर के कल्याण-कार्य पर टिकना।
महत्वपूर्ण उद्धरण (यदि लागू)
यहोशू चैप्टर और यिर्मयह के अन्य भागों से सनद के रूप में जो भाष्यिक सार मिलता है, उसे नीचे जोड़ा गया है:
Matthew Henry और Albert Barnes तथा Adam Clarke की तात्त्विक भूमिका के अनुसार: “सत्य स्वतंत्र नहीं है; यह ईश्वर के न्याय और उसकी प्रतिपूर्ति के साथ जुड़ा है…” (नोट: नीचे दिये गये भाग में सीधे उद्धरण नहीं हैं, पर इन टिप्पणीकारों के समानात्मक विचारों का सार है।)