Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 8:14 पर आधारित टिप्पणी —hekriya संदेह और चेतावनी
यह पद एक तीखी शिकायत और गहरे आक्रोश को दर्शाता है: समुदाय क्यों चुप है और चुप बैठे बिना आगे बढ़ने की बजाय टूट-फूट कर नाश की ओर बढ़ रहा है? यिर्मयह भविष्यद्वक्ताओं के माध्यम से उस समय के इस्राएלי समाज की आध्यात्मिक फिरौती माँगता है: पाप के कारण परमेश्वर ने उन्हें दंडित किया है, और वे विष पी रहे हैं। यह वाक्य व्यवहारिक रूप से एक सामाजिक-नैतिक आह्वान है—जो लोग कड़ी नज़र और आस्था से नहीं चलते, उनसे सावधान रहने को कहता है।
पद का परिचय और अध्याय-प्रसंग
यिर्मयाह की पुस्तक में ईश्वर के संदेशवाहक यिर्मयाह ने तब के जनता के कठोर पापों को उजागर किया। अभी के अध्याय 8 में, धार्मिक औपचारिकता, वास्तविक श्रद्धा की कमी और नेतृत्व की भ्रांति स्पष्ट हैं।Verse में उद्धृत पंक्तियाँ जनता से कहा गया स्पष्ट प्रश्न हैं: “हम क्यों चुप-चाप बैठे हैं?” उनके समय की सुरक्षा-पूर्णता—गढ़वाले नगरों की रक्षा—के पीछे भी उद्धत अविश्वास और अराजकता है।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
यह वाक्य दो प्रमुख विचार प्रस्तुत करता है:
अन्य बाइबल पदों के साथ सम्बन्ध
कुछ प्रमुख क्रॉस-रेफरेंसेज जो इस पाठ के अर्थ को स्पष्ट करती हैं:
इन क्रॉस-रेफरेंसेज से यह स्पष्ट होता है कि पाप के कारण सामाजिक विपत्ति स्वाभाविक है, और उद्धार की राह वास्तविक बदलाव में है—मन, व्यवहार और उपासना में ईश्वर की दिशा के अनुसार परिवर्तन।
आचार-चिंतन और व्यावहारिक उपयोग
इस पद से हमें तीन उपयोग मिलते हैं:
संक्षेप और सार
यिर्मयाह 8:14 हमें एक स्पष्ट चेतावनी देता है: पाप की वास्तविकता से अनदेखी करना समाज को और पथभ्रष्ट बनाता है; चुप्पी को तोड़कर, आत्म-परख और ईश्वर के पास पलटना आवश्यक है। यह पाठ उस समय के समाज के बारे में है, पर आज भी यह नीति सच है: सच्ची सुधार वही है जो दिल और व्यवहार दोनों में परिवर्तन लाए।
अनुमानित उद्धरण (यदि उपलब्ध): Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के संग्रहीत टिप्पणी से संबद्ध बिंदुओं का सार इस लेख में समाहित है।