Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
यूहन्ना 5:1 यूहन्ना 5:2 यूहन्ना 5:3 यूहन्ना 5:4 यूहन्ना 5:5 यूहन्ना 5:6 यूहन्ना 5:7 यूहन्ना 5:8 यूहन्ना 5:9 यूहन्ना 5:10 यूहन्ना 5:11 यूहन्ना 5:12 यूहन्ना 5:13 यूहन्ना 5:14 यूहन्ना 5:15 यूहन्ना 5:16 यूहन्ना 5:17 यूहन्ना 5:18 यूहन्ना 5:19 यूहन्ना 5:20 यूहन्ना 5:21 यूहन्ना 5:22 यूहन्ना 5:23 यूहन्ना 5:24 यूहन्ना 5:25 यूहन्ना 5:26 यूहन्ना 5:27 यूहन्ना 5:28 यूहन्ना 5:29 यूहन्ना 5:30 यूहन्ना 5:31 यूहन्ना 5:32 यूहन्ना 5:33 यूहन्ना 5:34 यूहन्ना 5:35 यूहन्ना 5:36 यूहन्ना 5:37 यूहन्ना 5:38 यूहन्ना 5:39 यूहन्ना 5:40 यूहन्ना 5:41 यूहन्ना 5:42 यूहन्ना 5:43 यूहन्ना 5:44 यूहन्ना 5:45 यूहन्ना 5:46 यूहन्ना 5:47



यूहन्ना 5:38 पर टिप्पणी (HINIRV)
यूहन्ना 5 अध्याय में यीशु ने अपने विरोधियों के साथ आध्यात्मिक परीक्षण किया; वे यह दिखाने को तैयार थे कि वे परमेश्वर के दर्शन और कार्य को मानते हैं, परन्तु वास्तव में वे जिस संदेश और उद्धारकर्ता को पहचाने थे, उस पर ईमान नहीं रख रहे थे।Verse 38 में यीशु स्पष्ट कहते हैं कि परमेश्वर के वचन और उसके भेजे हुए पर विश्वास न करने से यह चिह्न स्पष्ट होता है कि उनकी आस्था स्रोतहीन है। यह कथन उन लोगों के लिए है जो धर्म के साथ भ्रमित थे, परन्तु हृदय में ईमान नहीं था।
मुख्य अर्थ
इस वाक्य का केंद्र यह है कि परमेश्वर का भेजा हुआ वही है जिस पर विश्वास करना चाहिए। जहाँ लोग शास्त्रों के अध्ययन में रुचि रखते हैं, वहां भी सच्चे विश्वास का परीक्षण यह है कि क्या वे जिस संदेश और प्रभु को मानते हैं, उस पर निर्भर रहते हैं। जिसमें यीशु ने कहा, वे उसे नहीं मानते जिसे उसने भेजा, इसका मतलब यह है कि उनका धार्मिक परिधान देखने लायक हो सकता है, परन्तु आंतरिक अधर्म और अविश्वास उन्हें पीछे धकेल रहा है।
तीन प्रमुख विषय
क्रॉस-रेफरेंस (संक्षेप में)
- प्रेरित पतरस के द्वारा प्रेरित उपदेशों में उद्धारकर्ता की पहचान पर जोर: जो विश्वास उसकी ही रौशनी में चलता है, वह सत्य में है।
- रोमी 10:17 के साथ संयोजन में: विश्वास सुनने से उत्पन्न होता है, और सुनना ईसा तक पहुंचता है।
- योहना 3:18 के साथ: जो नहीं मानता, उसका परिणाम ईमान की कमी है; पर जो मानता है, वह जीवन पाता है।
व्यावहारिक चिंतन
अपने जीवन के परीक्षण में यह पूछिए: क्या मेरा विश्वास उन दृढ़ संदेशों पर टिकता है जो यीशु ने दिया है—ख़ासकर उद्धार की राह, पाप-निवारण, और परम पिता के साथ पुनः संबंध? क्या मेरी धार्मिक गतिविधियाँ मेरे हृदय की स्वीकृति और भरोसे का प्रदर्शन करती हैं, न कि सिर्फ बाहरी कर्मों का? जब विवेक-समस्या आए, तब भी मैं उतनी ही निष्ठा से प्रभु की भेजी हुई राह पर चलना चुनता हूँ।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यूहन्ना 5:38 हमें याद दिलाता है कि सही धार्मिकता वही है जिसमें आत्म-विश्वास, प्रभु के संदेश पर स्थिर विश्वास, और उसके द्वारा दी जाने वाली शांति के लिए दिल एकाग्र रहता है। केवल वचनों का अध्ययन नहीं, बल्कि उनके अनुसार चलना और उन्हें निभाना आस्था की वास्तविक पहचान है।
संक्षिप्त उद्धरण चित्रण
यदि आप पूर्वजनों के विचारों की रुचि पाते हैं, तो मैथ्यू हेनरी, एल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के सार्वजनिक-डोमेन विचारों से मिलते-जुलते प्रेरणा मिलती है—पर यहाँ उद्धरणों के संक्षिप्त उल्लेख ही प्रयाप्त हैं: "जो भेजे गए पर विश्वास नहीं करते," इस तरह के कथनों में वे आस्था के स्रोत की भूमिका को उजागर करते हैं।
Cross-reference के रूप में जो विचार सामने आते हैं, वे यीशु के संदेश की प्राथमिकता और विश्वास की दिशा को स्पष्ट करते हैं, ताकि पाठक अपने हृदय को सत्य की ओर मोड़ सके।