Old Testament
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यूहन्ना 5:1 यूहन्ना 5:2 यूहन्ना 5:3 यूहन्ना 5:4 यूहन्ना 5:5 यूहन्ना 5:6 यूहन्ना 5:7 यूहन्ना 5:8 यूहन्ना 5:9 यूहन्ना 5:10 यूहन्ना 5:11 यूहन्ना 5:12 यूहन्ना 5:13 यूहन्ना 5:14 यूहन्ना 5:15 यूहन्ना 5:16 यूहन्ना 5:17 यूहन्ना 5:18 यूहन्ना 5:19 यूहन्ना 5:20 यूहन्ना 5:21 यूहन्ना 5:22 यूहन्ना 5:23 यूहन्ना 5:24 यूहन्ना 5:25 यूहन्ना 5:26 यूहन्ना 5:27 यूहन्ना 5:28 यूहन्ना 5:29 यूहन्ना 5:30 यूहन्ना 5:31 यूहन्ना 5:32 यूहन्ना 5:33 यूहन्ना 5:34 यूहन्ना 5:35 यूहन्ना 5:36 यूहन्ना 5:37 यूहन्ना 5:38 यूहन्ना 5:39 यूहन्ना 5:40 यूहन्ना 5:41 यूहन्ना 5:42 यूहन्ना 5:43 यूहन्ना 5:44 यूहन्ना 5:45 यूहन्ना 5:46 यूहन्ना 5:47



यूहन्ना 5:21 पर दृष्टिकोण
यह पद यूहन्ना के Gospel के भीतर स्थिर समझ को दर्शाता है: पिता मरे हुओं को उठाता और जिलाता है, उसी तरह पुत्र भी जिन्हें चाहता है, उन्हें जिलाता है। यहाँ प्रभु यीशु बतला रहे हैं कि परम पिता परमेश्वर के कार्यों का स्वरुप वही है जो पुत्र यीशु के कार्यों में प्रकट होता है। यह एक गम्भीर स्मरण है कि ईश्वर जीवन का स्रोत है और जीवन जी उठना, उद्धार और पुनःजीवन का काम उसके द्वारा ही संचालित होता है।
चapter पर विचार
यूहन्ना 5 अध्याय में यीशु के उपस्थिति में सूचित किया गया है कि ईश्वर के राज्य का कार्य केवल बाहरी चिह्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मा के द्वारा लोगों की स्थिति को नया बनाता है। इस अध्याय की कहानी में यीशु एक रोगी को चंगा करते हैं, परन्तु मूल संदेश यह है कि जीवन और मृत्यु का अधिकार परम पिता के हाथ में है और जो कुछ पिता देता है, वही पुत्र भी करता है।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
इस पद का मुख्य पाठ दो आयामों में उभरता है: रिहाई और अधिकार। पहिलो, पिता मृतकों को उठाते और जीवन देते हैं; दूसरा, यीशु वह अधिकार ग्रहण करते हैं क्योंकि वे पिता के लिए समान हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि यीशु के कार्यों में आत्म-स्थापना नहीं, बल्कि परमेश्वर के महान उद्धारकार्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है। हमारा विश्वास surer हो कि जीवन का स्रोत एक ही है और उसे मानना ही जीवन पाना है।
अन्य बाइबिल संदर्भों से तुलना
– प्रेषित पौलुस के शब्दों में, ईश्वर जो जीवित करते हैं, वही जीवन में उद्धार का मार्ग खोलते हैं (रोमियों 8:11 के समान विचार)। यह दिखाता है कि आत्मा के कारण जीवन आना परमेश्वर का ही काम है, हमारे प्रयास नहीं।
– योहेदा 1:21-22 में जीवन की उद्घोषणा और आत्मिक पुनर्जीवन की आशा दृढ़ उल्लेखित है, जो इस संदर्भ के साथ मानवीय स्थिति में विश्वास की पुष्टि करता है।
– मत्ती 11:25-27 में पिता की इच्छा और पुत्र के समानाधिकार का बोध फिर से उभरता है, जो इस वचन के theological ढांचे को सुदृढ़ करता है।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
क्रॉस-रेफरेंसेस और उनका संक्षेप
1) रोमियों 8:11 — आत्मा का जीवनदायिनी प्रभाव बताता है; यह इस वाक्य के जीवन-उद्धार के आशय को समर्थन देता है।
2) मत्ती 11:25-27 — पिता-के साथ पुत्र के संबंध की गहराई व्याख्या करता है, जो समान अधिकार और ज्ञान को दर्शाता है।
3) योहेदा 1:21-22 — जीवन की भविष्यवाणी और प्रेमपूर्ण ऊर्ध्वाधर दृष्टिकोण को जोड़ता है।
संक्षेप
यूहन्ना 5:21 हमें सिखाता है कि जीवन और मृत्यु का अधिकार परम पिता के पास है और यीशु उसी कार्य को आगे बढ़ाते हैं। यह विश्वासयोग्य स्मरण है कि जीवन नया बनता है जब हम पिता की करीबी में आते हैं और पुत्र के शिक्षा-प्रकाश में चलते हैं।
HINIRV के भीतर यह पाठ विमर्श का केंद्र है कि उद्धारकार्य समान सत्ता के है—पिता के प्रेम और पुत्र की प्रमुख भूमिका में—जो हर जीवित को जिलाने की क्षमता देता है।
नोट: इस पंक्ति के सामान्य अर्थ पर Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-domain टिप्पणियों से प्रेरित, परन्तु मूल वाक्यों का संक्षेप ही उद्धृत किया गया है; इन टिप्पणीकारों के संक्षेप विचारों के अनुरूप ही संरचना बनायी गयी है।