Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
यूहन्ना 5:1 यूहन्ना 5:2 यूहन्ना 5:3 यूहन्ना 5:4 यूहन्ना 5:5 यूहन्ना 5:6 यूहन्ना 5:7 यूहन्ना 5:8 यूहन्ना 5:9 यूहन्ना 5:10 यूहन्ना 5:11 यूहन्ना 5:12 यूहन्ना 5:13 यूहन्ना 5:14 यूहन्ना 5:15 यूहन्ना 5:16 यूहन्ना 5:17 यूहन्ना 5:18 यूहन्ना 5:19 यूहन्ना 5:20 यूहन्ना 5:21 यूहन्ना 5:22 यूहन्ना 5:23 यूहन्ना 5:24 यूहन्ना 5:25 यूहन्ना 5:26 यूहन्ना 5:27 यूहन्ना 5:28 यूहन्ना 5:29 यूहन्ना 5:30 यूहन्ना 5:31 यूहन्ना 5:32 यूहन्ना 5:33 यूहन्ना 5:34 यूहन्ना 5:35 यूहन्ना 5:36 यूहन्ना 5:37 यूहन्ना 5:38 यूहन्ना 5:39 यूहन्ना 5:40 यूहन्ना 5:41 यूहन्ना 5:42 यूहन्ना 5:43 यूहन्ना 5:44 यूहन्ना 5:45 यूहन्ना 5:46 यूहन्ना 5:47



वाक्य का तुरन्त अर्थ
यीशु यहाँ स्पष्ट कहते हैं कि उनका उद्देश्य मनुष्यों से प्रशंसा या मान-सम्मान प्राप्त करना नहीं है। वे मानवीय प्रशंसा को गतिविधि का लक्ष्य नहीं मानते, बल्कि परमेश्वर की इच्छा और सत्य की पुष्टि उनके प्रमुख उद्देश्य हैं।
संदर्भगत पृष्ठभूमि
यह वचन यूहन्ना अध्याय 5 के संदर्भ में आता है, जब यहूदी नेता यीशु पर आरोप लगाते हैं कि वे परमेश्वर को अपने पिता के रूप में बताकर परमेश्वर की प्रतीज्ञा को घटा रहे हैं। उस संघर्ष के बीच यीशु ने अपने कामों और प्रेरणा के स्रोत की रक्षा की—उनका अधिकार और प्रामाणिकता परमेश्वर से थे, न कि मनुष्यों की मान्यता से।
व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ
1) "मैं मनुष्यों से आदर नहीं चाहता"—यह निवेदन नहीं बल्कि घोषणा है। यीशु व्यक्तिगत प्रसिद्धि या सामाजिक स्वीकृति को प्रेरक कारण के रूप में खारिज कर रहे हैं।
2) यह वचन उनके समग्र मिशन से मेल खाता है: न्याय, उपचार और सच्चाई की घोषणा। यीशु का लक्ष्य आत्म-प्रशंसा नहीं, बल्कि स्वर्गीय पिता की महिमा और मानिसक उद्धार था।
3) समकालीन विवाद में यह कथन निर्णायक था क्योंकि यह दर्शाता है कि उनके क्रियाकलापों का अधिकार मानवीय संस्थाओं से नहीं, बल्कि दिव्य प्रमाणों से आता है (उदाहरण: पिता द्वारा भेजे जाना और पुनरुत्थान का अधिकार)।
थीमेटिक सूची
संबंधीत शास्त्रावलियाँ और समेकित कारण
1) मत्ती 6:1 — यहाँ यीशु भी सार्वजनिक भलाई या पूजा में दिखावे से सावधान होने को कहते हैं; दोनों स्थानों मनुष्यों से प्रशंसा की चाह को चेतावनी के रूप में रखा गया है।
2) यूहन्ना 8:54 — इसी सर्ग में यीशु कहता है कि वे पिता जाने और इज्जत पाने को चाहते हैं; यह 5:41 के कथन को संतुलित करता है: वे मनुष्यों की प्रशंसा नहीं, परमेश्वर की इज्जत चाहते हैं।
3) गलीलियों के प्रसंग (यूहन्ना 4:34) — जहां भी यीशु का "पिता का काम" की बात आती है, वह मानव मान्यता से ऊपर रहती है; यह वचन समूचे सेवा दृष्टिकोण से संगत है।
मत्ते हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स, और आदम क्लार्क से संक्षिप्त संदर्भ
मैथ्यू हेनरी ने उल्लेख किया है कि सच्चा सेवक मानवीय प्रशंसा की अपेक्षा नहीं रखता; अल्बर्ट बार्न्स ने यह रेखांकित किया कि यीशु का अधिकार ईश्वरीय स्रोत से प्रमाणित है; आदम क्लार्क ने इस वाक्य के सामाजिक-धार्मिक निहितार्थों पर प्रकाश डाला। (उपरोक्त विचारों के अनुवादित सारांश हैं; मैंने इनके शब्दों का कोई छोटा उद्धरण यहाँ नहीं रखा।)
व्यावहारिक निष्कर्ष
यह वचन आज के पाठक को यह दो चीजें याद दिलाता है: अपनी सेवा के प्रेरणास्त्रोत की जाँच करें—क्या हम लोगों की प्रशंसा चाह रहे हैं या ईश्वर की इच्छा पूरा करना चाहते हैं? और सार्वजनिक मान्यता की खोज कभी-कभी कार्य की शुद्धता को भ्रष्ट कर देती है; इसलिए ईमानदार सेवा अंदर से प्रेरित होनी चाहिए।