Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
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मत्ती 24:3 पर टिप्पणी (HINIRV)
जब यीशु जैतून पहाड़ पर बैठा था, चेलों ने पास आकर पूछ लिया, “इन चीज़ों के होने की कौन-सी घड़ी है? तेरे लौटने और जगत के अंत के चिन्ह क्या होंगे?” यह प्रसंग उन प्रश्नों के साथ जुड़ा है जो उसके अंतकालीनप्रकाश के बारे में केंद्रित हैं। वरदान यह है कि यीशु ने उस समय के संकेतों को एक व्यवस्थित ढांचे में पेश किया ताकि विश्वासीज़ सावधानीपूर्वक जानें कि किस क्रम में घटनाएँ घटेंगी और किस भरोसे पर वे स्थिर रहें।
मुख्य अर्थ
यह वाक्य चेलों की जिज्ञासा का उन्नत चरण दिखाता है: आध्यात्मिक तैयारी की माँग के साथ भविष्य की घटनाओं के बारे में स्पष्टता। यीशु जानबूझकर चेतावनी देते हैं कि समय-समयों में बहकी सोच से बचना चाहिए; बल्कि, वे संकेत देते हैं जो सतर्कता और दृढ़ विश्वास को प्रेरित करें।
मुख्य विषय
पुष्ट विचार/कुंजी प्वाइंट्स
– प्रभु के आगमन की अंतिम तिथि की पुख्ता जानकारी नहीं दी गई, पर संकेतों की दिशा स्पष्ट की गई है।
– पवित्र जीवन और विश्वास-योग्यता के अनुरूप तैयारी ही सही उत्तर है; घबराहट या उदासीनता से बचना चाहिए।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप में)
1) 마र्k 13:5-8: Jesus warns about many that will come in His name, signaling enduring discernment amid calamitous signs. यह संकेत देता है कि चित्त को स्थिर रखना अति आवश्यक है।
2) लूका 21:7-11: Jesus elaborates on señales and the political and natural upheavals that precede His return, emphasizing vigilance.
3) प्रकाशित 6:12-17: अंर्तदृष्टि परन्तु गहरी चेतावनी कि आकाश-झंकार और पृथ्वी-हठाहट के बीच परमेश्वर के दिन आ पहुँचेगा।
व्यावहारिक चिंतन
हम किन्हीं भुगतनों या समाचारों से भय को नहीं, बल्कि धैर्य और प्रार्थना से उत्तर दें। अपने शब्दों और कर्मों में यीशु के शुद्ध जीवन के आचरण को बनाए रखें; लोगों के साथ नम्रता और करुणा दिखाएं ताकि अंत के दिनों में भी हमारा ejemplary जीवन एक संकेत बने।
संक्षिप्त सार
चेलों की जिज्ञासा का उद्देश्य केवल भविष्य की घटनाओं को जानना नहीं था, बल्कि अपनी दैनिक आचार-व्यवहार को अधिक पवित्र बनाना था। यीशु ने चेतावनी दी कि संकेतों के पीछे आत्म-विश्वास बनाए रखें और उनकी प्रतीक्षा में दृढ़ रहें।