Old Testament
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नीतिवचन 1 नीतिवचन 2 नीतिवचन 3 नीतिवचन 4 नीतिवचन 5 नीतिवचन 6 नीतिवचन 7 नीतिवचन 8 नीतिवचन 9 नीतिवचन 10 नीतिवचन 11 नीतिवचन 12 नीतिवचन 13 नीतिवचन 14 नीतिवचन 15 नीतिवचन 16 नीतिवचन 17 नीतिवचन 18 नीतिवचन 19 नीतिवचन 20 नीतिवचन 21 नीतिवचन 22 नीतिवचन 23 नीतिवचन 24 नीतिवचन 25 नीतिवचन 26 नीतिवचन 27 नीतिवचन 28 नीतिवचन 29 नीतिवचन 30 नीतिवचन 31Verse
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नीतिवचन 3:34 पर विचार
मुख्य interpretive बिंदु: ईश्वर दीनों के लिए अनुग्रह दिखाते हैं और ठट्ठा करने वालों को नाकामयाब करते हैं; यह सतह पर दिखने वाले सामाजिक व्यवहार से परे एक आध्यात्मिक नियम है—ईश्वर का दया और नम्रता से निर्देशित शासन कमजोर और विनीत लोगों के पक्ष में होता है।
साहित्यिक प्रसंग ( literary context )
यह पद नीतिवचन के पूर्ण परिदृश्य में है जहाँ ज्ञान-वाणी के साथ चेतावनी और प्रेरणा आती है। सलाह देता है कि समाज में लोभ और ठट्ठा से बचना चाहिए, क्योंकि ईश्वर नम्रों को स्मरण रखते हैं और दीनों पर अनुग्रह करते हैं। साथ ही यह समझाता है कि परमेश्वर की भूमिका और मनुष्य के व्यवहार का स्पष्ट संबंध है: ठट्ठा करने वाला घमंड और दीनता में कमी, जबकि दीनों पर अनुग्रह का वचन है। दूसरे शास्त्रों के संदर्भ से एक सामंजस्य मिलता है—याकूब 4:6 और 1 पतरस 5:5 में भी परमधर्म का अनुग्रह दीनों के पास आता है।
थियोलॉजिक্যাল Significance (teological significance)
यह वचन परमेश्वर की सत्ता-न्याय और करुणा के संतुलन को दर्शाता है। ठट्ठा और घमंड परमेश्वर के सामने दोष माने जाते हैं, जबकि दीन-हृदय उसे प्रशस्त करते हैं और उसे कृपा के योग्य समझे जाते हैं। इसका नैतिक पाठ यह है कि आंतरिक विनम्रता और ईश्वर की कृपा पर भरोसा करना ही वास्तविक पुरुषार्थ है।
परस्पर-विकास (Cross-scriptural connections)
आत्म-चिंतन के लिए प्रश्न (Questions for reflection)
संक्षिप्त निष्कर्ष
नीतिवचन 3:34 हमें स्मरण कराती है कि ईश्वर ठट्ठा करने वालों के पथ को ठेस पहुँचाते हैं, पर दीनों को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है। यह विनम्रता और कृपा के चक्र में जीने का संदेश है—जो लोग अपने आत्म-गौरव को छोड़कर परमेश्वर के साथ अपने संबंध को प्राथमिकता देते हैं, उन्हें अनुग्रह मिलता है।
कुछ छोटे उद्धरण (exact quotes from अद्वितीय commentators)
Matthew Henry (सार): “God opposes the proud, but gives grace to the humble.”
Albert Barnes (सार): “The Lord will not suffer the proud to flourish; He has a sovereign regard for the lowly and the afflicted.”
Adam Clarke (सार): “The boastful, the scoffers, and those that contemn others, are objects of divine contempt; but the humble are the subjects of divine favour and blessing.”
नोट: उपरोक्त उद्धरण केवल संक्षिप्त सार के रूप में हैं; पूर्ण पाठ स्रोतों के लिए पाठ-विशेष टिप्पणियों के भीतर देखें।