भजन संहिता 135:15 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

अन्यजातियों की मूरतें सोना-चाँदी ही हैं, वे मनुष्यों की बनाई हुई हैं।

भजन संहिता 135:15 पद-दर-पद बाइबल टीका

अर्थ का सीधा सार

भजन संहिता 135:15 के अनुसार लोग मूर्तियों, सोने-चांदी की बनी प्रतिमाओं को दैवी-पत्र नहीं मानते; वे मनुष्यों द्वारा बनाई गई निर्जीव चीजें हैं जो वास्तविक ईश्वर की महिमा से कोसों दूर हैं। इसलिए यह पद यह स्मरण कराता है कि परमेश्वर के साथ सच्चे संबंध में मूर्तिपूजा की कोई जगह नहीं रहती; हमारा ध्यान और विश्वास उसकी अद्वितीय शक्ति और योजना पर रखना चाहिए।

संदर्भ और पृष्ठभूमि

यह टेक्स्ट भजनसंग्रह का भाग है जिसमें यहूदी समुदाय ने चमत्कार, प्रतिकार और परमेश्वर की महानता को दोहराया। इनगीतों में वे देवताओं की मूर्तियों की बुराइयों को स्पष्ट करते हैं जो अज्ञानता और अंधविश्वास से पैदा होती हैं। शासनकाल के अंतर्गत मूर्तिपूजा से तंग आकर संतप्त प्रजा अपने परमेश्वर के अनंत गुणों को याद दिलाती है कि यह उन्हीं के स्नेह और निर्देश का परिणाम है।

व्याख्यात्मक अवलोकन

  • धारणा: मूर्ति-पूजा मानवीय कल्पना की सीमाओं के भीतर रहती है; यह मनुष्य की रचना है, न कि ईश्वर की।
  • दोष वर्णन: सोने-चांदी जैसी मूल्यवान धातु भी जड़, निर्जीव और अक्षय नहीं है—ये मात्र मानव शिल्प के उत्पाद हैं, उनमें जीवन नहीं है।
  • निमंत्रण: ईश्वर की महिमा और सच्चे आराधन के लिए व्यक्ति को प्रेरित किया जाता है कि वह मूर्तियों के बजाय आत्मा-प्रकृति के साथ सीधी communion बनाए रखे।

कॉंटेक्स्ट-आइडिया (सूक्ष्म टिप्पणी)

यह निंदा दृश्य-आकर्षण को नहीं छोड़ती, बल्कि यह चेतावनी देती है कि भौतिक वैभव कितने भी महंगे क्यों न हों, पर वे ईश्वर के कुल गुण नहीं बदलते। भजनकार ने स्मरण दिलाया कि परमेश्वर वही है जिसने अंधकार को प्रकाश में बदला, और मूर्तिपूजा से उसकी प्रशंसा नहीं मिलती।

मुख्य विचारों की छोटी सूची

संबंधित अंश और संक्षिप्त व्याख्या

यशायाह 44:9-20— एक ही धातु से बनी मूर्तियों की दुविधा पर चोट; मूर्तियाँ “कौन बताएं” और मूर्तिपूजा के मूर्खतापूर्ण होने पर जोर।

1 कुरिन्थियों 12:2— पुराने अंधविश्वासों से निकलकर किस प्रकार ईश्वर के सच्चे स्वरूप के साथ जीवन जिया जाए, यह दर्शाता है।

रोमियों 1:22-23— अविश्वास के कारण मनुष्य ने सृजनहार की महिमा को बनावटों में बदल लिया, परंतु कृपा से उद्धार संभव है।

छोटा व्यावहारिक निष्कर्ष

हमारे जीवन की वास्तविक पूजा क्या है—क्या हम पदार्थों, धन या दिखावे पर भरोसा करते हैं, या परमेश्वर के चरित्र पर? ध्यान दें कि ईश्वर के साथ सच्ची आराधना में मन, विचार और व्यवहार एक-स्वर में रहते हैं; धर्मिक सक्रियताओं के पीछे भी प्रेम, नम्रता और निष्ठा की भावना होनी चाहिए।

कथन-योग्य उद्धरण (Public-domain स्रोतों से प्रेरणा)

यदि उपयोग में आए हों, तो आवश्यक रूप से स्पष्ट किया गया है कि मैथ्यू हेनरी, ऐलबर्ट बार्न्स या एडम क्लार्क के कौन से शब्द सीधे उद्धृत हैं। नीचे संक्षेप में तीनों के विचारों का सार उल्लेखित है:

मैथ्यू हेनरी के अनुसार मूर्तिपूजा में अविश्वास और कल्पना की एकदम सीमा है; ईश्वर के सच्चे रूप में श्रद्धा रखनी चाहिए।

ऐलबर्ट बार्न्स मूर्तिपूजा को मानव-निर्मित पदार्थों के प्रति झुकाव के रूप में देखते हैं, जो आध्यात्मिक जीवन से दूरी बनाती है।

एडन क्लार्क मूर्तियों के बारे में स्पष्ट करते हैं कि उनमें जीवन नहीं—केवल शब्दों और प्रतीकों की सीमाएँ हैं।

उपरोक्त विचार संक्षेप में एक साथ मिलकर यह बताते हैं कि परमेश्वर के साथ नजदीकी संबंध केवल ऐसी चीजों पर नहीं टिक सकता जिन्हें हम बनाते हैं; उसे जीवन के हर क्षेत्र में प्रथम स्थान देना चाहिए।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

भजन संहिता 135:15 समानांतर पद और संबंधित वचन

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उन लोगों की मूरतें* सोने चाँदी ही की तो हैं, वे मनुष्यों के हाथ की बनाई हुई हैं।

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यशायाह 37:19 (HINIRV) »
और उनके देवताओं को आग में झोंका है; क्योंकि वे ईश्वर न थे, वे केवल मनुष्यों की कारीगरी, काठ और पत्थर ही थे; इस कारण वे उनको नाश कर सके। (भज. 115:4-8, गला. 4:8)

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यशायाह 46:6 (HINIRV) »
जो थैली से सोना उण्डेलते या काँटे में चाँदी तौलते हैं, जो सुनार को मजदूरी देकर उससे देवता बनवाते हैं, तब वे उसे प्रणाम करते वरन् दण्डवत् भी करते हैं! (निर्ग. 32:2-4)

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