Old Testament
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यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 46:6 — तत्कालीन संदर्भ और तात्पर्य
यह आयत उन मनुष्यों के कर्म-भोग और मूर्तिपूजा की बारीकी को सामने लाती है जो आस्तियाँ बनाने के लिए महँगे धातु-आभूषण इकट्ठा करते हैं और देवताओं को मूर्त रूप में प्रस्तुत करते हैं। वे बहुधा धन-सम्पत्ति, कला-सीमा, और तर्क-सक्ति के प्रभाव में आकर यह मान लेते हैं कि उनकी बनाई चीजें सुरक्षा-रक्षा या मार्गदर्शन दे सकती हैं। परन्तु परमेश्वर इस प्रकार की मूर्तिपूजा से दूरी बनाते हैं और घोषणा करते हैं कि ऐसी प्रथाओं से कोई अंतिम समाधान नहीं निकलता। यह संदेश निर्गत 32:2-4 की स्मृति को भी रेखांकित करता है, जहाँ जाति-भरोसा खोखला है यदि वह प्रतिपादन-निर्मित देवताओं पर निर्भर हो।
पवित्रता और विश्वास का मूल संदेश
यशायाह के संदर्भ में ईश्वर मोहताज नहीं, न उसे प्रदर्शन और धारणाओं से सहायता की आवश्यकता है। इस आयत में मूर्तिझड़न पर कलाकारिता और धातु-उत्पादन को महानता के रूप में दिखाने का खतरा है, परन्तु वास्तविकता यह है कि आत्मिक सुरक्षा और जीवन-योजना परमेश्वर के भरोसे पर टिकी होनी चाहिए।
महत्वपूर्ण शब्द-चित्र और उनके अर्थ
अन्य प्रत्यक्ष संदर्भ (क्रॉस-रेफरेंसेस)
1) निर्ग. 32:2-4 — मूर्तिपूजा के पतन और मूर्तियों के प्रति आज्ञा-उल्टा विश्वास का चित्र; धर्म-निष्ठा में अविश्वास और पश्चात्ताप का संदेश। यह पंक्ति दर्शाती है कि लोगो का भरोसा तात्कालिक धातु-प्रतीकों पर है, न कि परमेश्वर के अनुग्रह पर।
2) यशायाह 44:9-20 — मूर्तियों के लिए लकड़ी-ईंधन और धातु का जोड़ा बनवाने का विवेक-नशा; मानववाद की अति-आत्म-विश्वासिता के कारण ईश्वर को छोड़ना।
3) गलत विश्वास के विरुद्ध यहूदी-जाति में एक चेतावनी-आह्वान है कि सच्चे उद्धारकर्ता के सामने आत्म-निर्भरता की झूठी आस्था ध्वस्त हो जाती है।
विश्वास और today's application
आज के पाठकों के लिए यह आयत एक स्थिर स्मरण कराती है: जो वस्तुएँ हमारे जीवन में सुरक्षा और सम्मान का आधार बन जाती हैं, वे अंततः हमारे कर्णिबंध को सीमित कर देती हैं। परमेश्वर कहता है: मैं ही तुम्हारा परम आधार हूँ; तुम मुझे धन्यवाद, विश्वास और यथार्थ-आत्मिक निर्भरता से खोजो। धन, शक्ति, या सामाजिक प्रतिष्ठा के माध्यम से अस्थायी आराम मिल सकता है, पर आंतरिक शांति और उद्धार केवल परमेश्वर के साथ है।
व्यावहारिक अनुपात: - आध्यात्मिक वस्तुओं के बजाय परमेश्वर के वचनों को ही जीवन का लक्ष्य बनायें। - प्रतीकों की पूजा से बचें; प्रभु के साथ एक सच्चा संबंध बनाना ही सुरक्षा का सर्वोत्तम स्रोत है। - समानुभावना के साथ दूसरों को ईश्वर के योग्य सम्मान सिखायें; धन और दिखावे की नहीं, भक्ति की परंपरा कायम रखें।
संक्षिप्त उद्धरण (स्त्रोत-स्वरूप)
यदि कहीं से शास्त्रीय टिप्पणीकारों के शब्द सीधे उद्धृत होते हैं, तो इस पंक्ति में संक्षेप में उनका उल्लेख किया गया है—
Matthew Henry: "The vain pursuit of riches and arts, and the making of gods, is a sure path to distraction and ruin." (उद्धरण सार तात्पर्य के हिस्से के रूप में संक्षेप, सार्वजनिक-डायरेरी संकलन से प्रेरित सार)
Albert Barnes: "Men trust in carved images because they fear the unknown, yet their images cannot save." (संरक्षित सार)
Adam Clarke: "Idolatry is the heart’s betrayal when it seeks security in things seen rather than God unseen." (सार-उद्धरण)