यशायाह 46:7 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

वे उसको कंधे पर उठाकर लिए फिरते हैं, वे उसे उसके स्थान में रख देते और वह वहीं खड़ा रहता है; वह अपने स्थान से हट नहीं सकता; यदि कोई उसकी दुहाई भी दे, तो भी न वह सुन सकता है और न विपत्ति से उसका उद्धार कर सकता है।

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यशायाह 46:7 पद-दर-पद बाइबल टीका

यशायाह 46:7 का सहज अर्थ

यह पद उन निर्वाणशक्ति-परिशुद्ध मूर्तियों की प्रशंसा के विरुद्ध है जो लोग अपनी बात जाँचते-परखते समय अक्सर भरोसा करते हैं। यह संदेश स्पष्ट करता है कि असली उद्धार और सहायता जो मानव-शक्ति से नहीं मिलती, वह केवल परमेश्वर से आती है; मूर्तियाँ खुद नहीं सुन सकतीं, न वहातां दे सकतीं, न संकट में सहायता कर सकतीं।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

यशायाह के समय यह एक स्पष्ट आरोप है: आकाशीय परमेश्वर के विरुद्ध उन लोगों ने मूर्तिपूजा का सहारा लिया। बाइबल में इस प्रकार के ताना-प्रत्यक्ष अक्सर दिखते हैं—क्योंकि लोग सांसारिक वस्तुओं के भरोसे से जल्दी राहत चाहते हैं, पर ईश्वर की योजना और निहितार्थ दृढ़ रहते हैं। यहाँ संदेसा यह है कि मूर्तियाँ केवल मनुष्यों की कल्पना के उपकरण हैं, वे वास्तविक शक्ति नहीं रखतीं।

व्याख्यात्मक विश्लेषण

  • कंधे पर उठाने और स्थान पर रखने— मूर्ति-वस्तुओं की महत्ता उनके भौतिक रूप में है, पर वे जीवित नहीं। यहीं से यह व्यंग्य उभरता है: वे सहायता नहीं दे सकतीं, क्योंकि वे इंसानी कल्पना की उपज हैं और सच्चाई से अलग हैं।
  • वापस न हिलने की शक्ति— मूर्ति का “स्थायित्व” दिखाने की कोशिश एक मिथ्या सुरक्षा है; जबकि परमेश्वर वही है जो स्थिर, सर्वज्ञ और शक्तिमान है।
  • दोहाई से निष्क्रियता— दहाई देने पर भी मूर्ति कान नहीं देती, न उद्धार संभव। यह दर्शाता है कि वास्तविक उद्धार और कानाफूसी केवल परमेश्वर के पास है, न किसी पुतले के पास।

मुख्य विचार

  1. मनुष्य इन्सानी पदार्थों पर अंधविश्वास न करके परमेश्वर के सच्चे उद्धार पर भरोसा करे।
  2. मूर्तिपूजा भ्रम है; केवल ईश्वर ही संकट में जीवन देता है।
  3. कठिन समय में भी परमेश्वर के साथ रहने की आशा बनी रहे, क्योंकि वह सुनता, समझता और उद्धार करता है।

अनुसरणीय पाठ और संक्षिप्त व्याख्या

यशायाह 44:6–8 में परमेश्वर स्वयं को एक अटल स्रोत के रूप में स्थापित करते हैं—“मैं पहला और मैं अंत हूँ।” यह पंक्ति स्पष्ट करती है कि मूर्ति-पूजा से परे, ईश्वर वास्तविक वैध सत्ता है।

Psalm 115:4–8 भी यह बताता है कि मूर्तियाँ निंदनीय वस्तुएँ हैं जो कान नहीं सुनतीं—परमेश्वर कितनी भिन्न सत्ता रखते हैं, यह तुलनात्मक रूप से उजागर होता है।

1 कुरिन्थियों 8:4–6— एकेश्वरवाद के साथ बहस की जगह मात्र एक खाते हैं: “ये मूर्तियाँ क्या हैं?” ईश्वर एक ही है, जिनमें सब आस्था होनी चाहिए।

संदर्भ-योग्य क्रॉस-रेफरेंसेस

- यशायाह 44:9–11: मूर्ति-निर्माण की निरर्थकता का स्पष्ट चित्रण; मूर्तिपूजा के कारण भ्रम और निराशा।

- एदल-यशायाह 46:1–2: मूर्तियाँ उठती-बैठती हैं, पर उनकी सहायता नहीं; वे निर्जीव हैं।

- रोम 1:22–23: मूर्ति-पूजा के दुष्परिणाम, जो ज्ञान की बात से विमुख हो जाते हैं।

संक्षिप्त व्यवहारिक प्रेरणा

जीवन की कठिनाइयों के समय हमारे कदम परमेश्वर के पास जाने चाहिए। मूर्तियों पर भरोसा करना अस्थायी राहत देता है, पर ईश्वर से मिला साहस और दिशा स्थायी है। जड़ता और अंधविश्वास से ऊपर उठकर हम उसकी ओर झुकें; जो सुने, देखे और उद्धार दे सकता है—वही हमारा एकमात्र सहारा है।

नोटिंग उद्धरण (public-domain commentators)

यदि आवश्यक हो, इस विचार-पत्र में मैथ्यू हेनरी, ऐल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के मौलिक स्रोत-उद्धरण मानक के अनुसार उपयोग किया गया है। जहां उनके विचार सीधे उद्धृत किए गए हों, वहाँ संक्षेप में उल्लेख किया गया है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यशायाह 46:7 समानांतर पद और संबंधित वचन

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“हे जाति-जाति में से बचे हुए लोगों, इकट्ठे होकर आओ, एक संग मिलकर निकट आओ! वह जो अपनी लकड़ी की खोदी हुई मूरतें लिए फिरते हैं और ऐसे देवता से जिससे उद्धार नहीं हो सकता, प्रार्थना करते हैं, वे अज्ञान हैं।

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यिर्मयाह 10:5 (HINIRV) »
वे ककड़ी के खेत में खड़े पुतले के समान हैं, पर बोल नहीं सकती; उन्हें उठाए फिरना पड़ता है, क्योंकि वे चल नहीं सकती। उनसे मत डरो, क्योंकि, न तो वे कुछ बुरा कर सकती हैं और न कुछ भला।”

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यशायाह 46:1 (HINIRV) »
बेल देवता झुक गया*, नबो देवता नब गया है, उनकी प्रतिमाएँ पशुओं वरन् घरेलू पशुओं पर लदी हैं; जिन वस्तुओं को तुम उठाए फिरते थे, वे अब भारी बोझ हो गईं और थकित पशुओं पर लदी हैं।

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