Old Testament
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रोमियों 15:5 - परस्पर एकता के लिए धीरज और प्रोत्साहन
पवित्रशास्त्र का यह वचन प्रभु परमेश्वर के धैर्य और दया के बीच एकता स्थापित करने की दिशा देता है। रोमियों का संदर्भ विशेषकर नए समुदाय के भीतर भ्रातृत्व के भाव को मजबूत बनाने की चासनी है, जहाँ जिज्ञासु विचारों और विविध पृष्ठभूमियों के बावजूद एक ही मसीह यीशु के अनुयायी बनकर जीना है। यहाँ प्रेरित पौलुस परमेश्वर से यह विनती करते हैं कि भीतर के धीरज और परमेश्वर के प्रोत्साहन से आपस में एक मन और एक सिद्धांत हो।
मुख्य अर्थ
धीरज, और प्रोत्साहन का दाता परमेश्वर तुम्हें वरदान दे कि मसीह यीशु के अनुसार आपस में एक मन रहो। इसका अर्थ है—दिलों में स्थिरता, विश्वास की एकरूपता, और एक दूसरे के साथ प्रेमपूर्ण सहयोग। यह एकता ऐसी है जो मनमुटाव, विभाजन या आत्म-स्वार्थ से ऊपर उठकर ईश्वर के मार्ग पर चलना सिखाती है।
两-तीन प्रमुख विषय
संबद्ध पदों से संपर्क
तुलनात्मक संदर्भ बताता है कि बहुत से नए व पुराने समुदायों में एकता बनाए रखना परमेश्वर के राजा के राज्य के लिए आवश्यक है (जैसे कि सभाओं के बीच एकता, रोम 12:16; कुल 3:14-15). पवित्र आत्मा की क्रिया से प्रेरणा मिलती है जिससे विश्वासियों में एकता और सहानुभूति बढ़ती है (गल 5:22-23). यीशु के व्यवहार में भी प्रेम और सेवाभाव का एकीकरण स्पष्ट है—यही प्रेरणा रोमियों 15:5 के अनुरूप है।
प्रायोगिक विचार
क्रॉस-रेफरेंस और उनके अर्थ
याह बहुवचन संदर्भों में: Romans 12:16—यह बताता है कि एक दूसरे के साथ समभाव और एकता के साथ रहने से समुदाय मजबूत होता है। Ephesians 4:3—एकता की दिशा में धार्मिक चरित्र और अभ्यास का संयोजन। Galatians 5:22-23—पवित्र आत्मा के फल से प्रेम, joy, peace आदि की एकता बढ़ती है।
संक्षेप निष्कर्ष
रोमियों 15:5 में परमेश्वर की धीरज और प्रोत्साहन से प्रेरित होकर हम एक मन और एक मंच बनें—तीर्थीय यात्रा में एक दूसरे के साहचर्य, प्रेम और सहयोग से जातीय, वर्गीय या विचारगत भिन्नताओं से ऊपर उठकर मसीह यीशु के अनुसार जीवन जिएं। यह ईश्वर의 वरदान है जो समुदाय को स्थिर, सहनशील और समर्थ बनाता है।