Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
रोमियों 15:1 रोमियों 15:2 रोमियों 15:3 रोमियों 15:4 रोमियों 15:5 रोमियों 15:6 रोमियों 15:7 रोमियों 15:8 रोमियों 15:9 रोमियों 15:10 रोमियों 15:11 रोमियों 15:12 रोमियों 15:13 रोमियों 15:14 रोमियों 15:15 रोमियों 15:16 रोमियों 15:17 रोमियों 15:18 रोमियों 15:19 रोमियों 15:20 रोमियों 15:21 रोमियों 15:22 रोमियों 15:23 रोमियों 15:24 रोमियों 15:25 रोमियों 15:26 रोमियों 15:27 रोमियों 15:28 रोमियों 15:29 रोमियों 15:30 रोमियों 15:31 रोमियों 15:32 रोमियों 15:33



रोमियों 15:7 परिज्ञानात्मक टिप्पणी
पाठ का संक्षिप्त अवलोकन: रोमियों के संदेश का यह अंश freshly स्थापित समुदाय में एकता की मांग करता है। मसीह ने परमेश्वर की महिमा के लिये हमें ग्रहण किया है, ताकि हम एक-दूसरे को ग्रहण करें। इसका मतलब है—स्वतंत्र व्यक्तिगत अधिकारों के स्थान पर, प्रेम-सम्बंध और एकत्व की व्यवस्था। यह उद्धार की उत्सर्ग-भावना को व्यवहारिक रूप में दर्शाता है: बाहरी भिन्नताओं के बावजूद भीतर से एकात्मता की पहल।
पर्वchapter में यह विचार
रोमियों 15 अध्याय में पापा लेखक पोस्त्रता के लिए एके सामाजिक-धार्मिक समन्वय का आह्वान है। यहाँ चहेते भाइयों-बहनों के बीच स्वीकार्यता, सहनशीलता और एक दूसरे के कार्यों को सम्मान देने का निर्देश है। verse 7 विशेष रूप से 'जैसा मसीह ने परमेश्वर की महिमा के लिये तुम्हें ग्रहण किया है, वैसे ही तुम भी एक दूसरे को ग्रहण करो' की प्रेरणा देता है कि हमारा संबंध परमेश्वर की महिमा के अनुरूप क्रिया-निष्ठ बने।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
मुख्य पाठ यह है कि उद्धारकर्ता के प्रकार-भिन्नता के बावजूद, विश्वासियों का सामाजिक-धार्मिक जीवन एकता के सूत्र से बंधा है। ग्रहण करना यहाँ दया, क्षमा और सम्मान का व्यवहार है—खासकर उन लोगों के साथ जो हमारे विचारों, पवित्र नियमों या पारिवारिक-समुदाय के हिसाब से भिन्न हैं। यह ग्रहण शरीर की विविधता को मान्यता देता है ताकि एक प्रेरित समुदाय परमेश्वर की महिमा में बढ़े।
पवित्र शास्त्रों के साथ तुलना
- मत्ती 5:7 के अनुसार करुणा की भावना से व्यवहार करना सीखते हैं;—- “धन्यता, एक-दूसरे के कृपामात्र से प्रेम करें।”
- 1 करिन्थियों 12:13 में कहा गया कि एक ही आत्मा के द्वारा सभी को एक ही शरीर में जोड़ा गया है; विविधताओं के बावजूद सह-अस्तित्व का महत्व स्पष्ट है।
इन पदों से समझ आता है कि ग्रहण करना केवल व्यक्तिगत व्यवहार नहीं, बल्कि समुदाय-जीवन के लिए ईश्वर-योजना का भाग है।
व्यावहारिक आवेदन
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप)
• रोमियों 12:16—हृदय में एकता की नीति; दूसरों के सहयोग में मेलजोल रखना।
• ईफिसियों 4:2–3—धैर्यपूर्ण तरीके से एकीकरण का प्रयास और आत्म-न्याय के बिना सौहार्द बनाए रखना।
व्याख्यात्मक स्पर्श: इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि ग्रहण करने का धर्म, व्यवहार में नम्रता और प्रेम से परिपूर्ण है, न कि स्व-स्वार्थ से संचालित।
संक्षेप सार
रोमियों 15:7 में प्रेरक संदेश यही है कि मसीह की महिमा के लिए हमने एक-दूसरे को ग्रहण करना चाहिए। यह एकता का आह्वान है जो व्यक्तिगत और संस्थागत दोनों स्तरों पर रिश्तों को संचालित करता है। यह ग्रहण हर प्रकार की असमानताओं को सुरक्षित दूरी पर नहीं छोड़ता, बल्कि प्रेम-सम्बन्धों को मजबूत कर परमेश्वर की महिमा के लिए एकता का जीवन देता है।
उद्धरण नोट: इस सम्पादन में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन तत्त्वों के विचारों को समाहित किया गया है; यदि उनके कोई संक्षिप्त उद्धरण उपलब्ध हों तो नीचे दिए गए पंक्तियों में उद्धृत किया गया है।