Old Testament
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रूत 1:13 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
तो भी क्या तुम उनके सयाने होने तक आशा लगाए ठहरी रहतीं? और उनके निमित्त पति करने से रूकी रहतीं? हे मेरी बेटियों, ऐसा न हो, क्योंकि मेरा दुःख तुम्हारे दुःख से बहुत बढ़कर है; देखो, यहोवा का हाथ मेरे विरुद्ध उठा है।”
रूत 1:13 पद-दर-पद बाइबल टीका
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रूत 1:13 समानांतर पद और संबंधित वचन
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अय्यूब 19:21 (HINIRV) »
हे मेरे मित्रों! मुझ पर दया करो, दया करो, क्योंकि परमेश्वर ने मुझे मारा है।

न्यायियों 2:15 (HINIRV) »
जहाँ कहीं वे बाहर जाते वहाँ यहोवा का हाथ उनकी बुराई में लगा रहता था, जैसे यहोवा ने उनसे कहा था, वरन् यहोवा ने शपथ खाई थी; इस प्रकार वे बड़े संकट में पड़ गए।

भजन संहिता 32:4 (HINIRV) »
क्योंकि रात-दिन मैं तेरे हाथ के नीचे दबा रहा; और मेरी तरावट धूपकाल की सी झुर्राहट बनती गई। (सेला)
परिस्थिति और तत्काल संदर्भ
रूत 1:13 नबी के नाते नाहूम की तरह तुरन्त नहीं, बल्कि एक परिवारिक त्रासदी के बाद की क्षोभपूर्ण वाणी है। यहपाठ उस समय में आता है जब नाओमी अपने दो दामादों और पति की मृत्यु के बाद अपने मुवाब की धरती से बेअबानी करके बेथलेहम लौटती है। उसने अपनी बहुओं—रूत और ओरफा—को सलाह दी कि वे अपने-अपने गृहों को लौटकर नए जीवन बनायें। यह वचन उसी भावनात्मक क्षण का अभिव्यक्तिकरण है: “क्या तुम मेरे लिए आशा छोड़ कर बैठी रहोगी?” नाओमी स्वयं को परित्यक्त और परमेश्वर के कार्यों के प्रभाव से दबा हुआ अनुभव कर रही है।
भौतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि
उस समय विधवाओं के लिए आश्रय और राष्ट्रीयता महत्वपूर्ण थे। नाओमी का भय केवल भावनात्मक नहीं, वह आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा था। इसलिए जब वह कहती है कि “यहोवा का हाथ मेरे विरुद्ध उठा है,” तो वह परमेश्वर की अनुमति से हुई कठिनाइयों और सामाजिक हानि को संकेत कर रही है।
इस आयत से ईश्वर और विश्वास के बारे में क्या प्रकट होता है?
यह वचन ईश्वर के प्राधिकारीपन और मनुष्य के दुख के बीच जटिल संबंध दिखाता है। नाओमी का कथन यह स्वीकारी भाव है कि परमेश्वर की कार्य-व्यवस्था उसके जीवन में कठिनाई का कारण बनी—यह विश्वास के परिक्षण और परमेश्वर के ऊपर निर्भरता की आवश्यकता को उजागर करता है। फिर भी पूरा अध्याय आगे चलकर दिखाता है कि परमेश्वर की चालें केवल दंडात्मक नहीं होतीं; वे मुक्ति और अनुग्रह की राह भी खोल सकती हैं।
महत्वपूर्ण शब्द और चित्र
“आशा लगाए ठहरी रहना”—यहाँ नाओमी की सूचना है कि वह चाहती है बहुएँ अपनी स्वतंत्र जीविका की ओर लौटें; “आशा लगाए रहना” व्यर्थ प्रतीक्षा का भाव बताता है, एक ऐसी आशा जो नतीजे के बिना रह जाए।
“यहोवा का हाथ मेरे विरुद्ध उठा है”—“हाथ” माध्यम है जिसकी सहायता से देवता कार्य करते हैं; जब हाथ “उठा” हुआ कहा जाता है तो वह विरोध या न्याय की तस्वीर देता है। परन्तु रूत की आगे की कथा में यह प्रतीक बदलता है: वही हाथ परवर्ती मुक्ति का मार्ग भी बनता है।
संबंधित संदर्भ और संक्षेप व्याख्या
मैथ्यू हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स और एदम क्लार्क — छोटे उद्धरण और संकेत
मैथ्यू हेनरी ने रूत के संदर्भ में लिखा है: "नाओमी का दुःख ऐसा था कि उसने अपने साहचर्य को व्यर्थ मान लिया" (संक्षिप्त उद्धरण)। अल्बर्ट बार्न्स इस पर टिप्पणी करते हैं कि नाओमी की भाषा स्वीकृति और आत्मसमर्पण का संकेत देती है, परन्तु इतिहास के आगे चलने पर उसका दिखाई भाव बदलता है। एदम क्लार्क ने उल्लेख किया कि “यहोवा का हाथ” बुरा होने के रूप में अनुभव हो सकता है परन्तु वह अक्सर उद्धार का मार्ग भी खुलवाता है।
आधुनिक जीवन के लिए उपयोग
नाओमी का अनुभव आज के पाठक को यह सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में आत्मा का ईमानदारी से व्यक्त होना वैध और आवश्यक है। किसी की पीड़ा उसे अकेला कर सकती है और वह परमेश्वर से दूर महसूस कर सकता है; फिर भी बाइबल की आगे की कथा हमें याद दिलाती है कि परमेश्वर की योजनाएँ परिकलित होती हैं और वे आश्चर्यजनक रूप से मुक्ति और पुनर्स्थापन का साधन बन सकती हैं।
व्यावहारिक फलक:
संक्षेप
रूत 1:13 नाओमी की हार्दिक आत्मा को बताती है जो अपने जीवन के संकट में परमेश्वर के काम को विपरीत मान बैठी है। परन्तु यह वचन अकेला नहीं; पूरे अध्याय में देखा जाता है कि दुःख के बावजूद विश्वास और ईश्वर की रहनुमाई आशा का स्रोत बन सकती है। नाओमी की ईमानदारी, बहुओं के निर्णय और परमेश्वर की अंतर्निहित योजना मिलकर यह सिखाती हैं कि दुख के समय सच्चाई से जीना और परमेश्वर पर निर्भर रहना आवश्यक है।