Old Testament
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रूत 1:8 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
तब नाओमी ने अपनी दोनों बहुओं से कहा, “तुम अपने-अपने मायके लौट जाओ। और जैसे तुम ने उनसे जो मर गए हैं और मुझसे भी प्रीति की है, वैसे ही यहोवा तुम पर कृपा करे।
रूत 1:8 पद-दर-पद बाइबल टीका
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रूत 1:8 समानांतर पद और संबंधित वचन
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रूत 1:5 (HINIRV) »
जब महलोन और किल्योन दोनों मर गए, तब नाओमी अपने दोनों पुत्रों और पति से वंचित हो गई।

रूत 2:20 (HINIRV) »
नाओमी ने अपनी बहू से कहा, “वह यहोवा की ओर से आशीष पाए, क्योंकि उसने न तो जीवित पर से और न मरे हुओं पर से अपनी करुणा हटाई!” फिर नाओमी ने उससे कहा, “वह पुरुष तो हमारा एक कुटुम्बी है, वरन् उनमें से है जिनको हमारी भूमि छुड़ाने का अधिकार है।”

इफिसियों 5:22 (HINIRV) »
हे पत्नियों, अपने-अपने पति के ऐसे अधीन रहो, जैसे प्रभु के। (कुलु. 3:18, 1 पत. 3:1, उत्प. 3:16)
रूत 1:8 पर टिप्पणी — संदर्भ और मुख्य विचार
इस पद में नाओमी बच्चों की पत्नी रूत और ओलिपह की बहुओं से कहती हैं कि वे अपने-अपने मायके लौट जाएं। यह कथा आरम्भ में दुखद है लेकिन इसके पीछे एक गहरी योजना के संकेत मिलते हैं। नाओमी का प्रस्ताव है कि वे अपने पूर्व सम्बन्धों पर लौटें ताकि वे अपने जीवन को सुरक्षित रख सकें। वह चाहती हैं कि वे परमेश्वर की कृपा पर निर्भर रहें, चाहे वर्तमान कष्ट उन्हें क्यों न नाच दे।
केंद्रीय अर्थ
यह वाक्य बताता है कि संकट के समय में व्यक्ति अपने निकट सम्बन्धों और पूर्वक ठहराव पर लौट सकता है, ताकि वे भरोसे पर टिके रहें—परमेश्वर की कृपा पर। नाओमी की यह सलाह भी प्रेमपूर्ण है: वह बहुओं के लिए एक सुरक्षित और सम्मानित मार्ग बनाती हैं, ताकि वे कठिन परिस्थितियों में भी आश्रय पाएं।
मुख्य थीम्स
संदर्भपूर्ण अंग
यह दृश्य रूत के समर्पण और अनुशासन की शुरुआत देता है—जो आगे जाकर दया और निष्ठा के मिसाल बनता है। साथ ही यह दिखाता है कि कठिन समय में भी परिवार और रिश्ते कैसे मार्गदर्शक पथ बन सकते हैं। नीचे दिए गए क्रॉस-रेफरेंसेज़ से इस विषय की गहराई को समझना संभव है:
व्यवहारिक विचार
हमALLE में यह सीख मिलती है कि जीवन के संकटों के बीच हमें किस तरह व्यवहार करना चाहिए: पहली प्राथमिकता है कि हम परमेश्वर की कृपा पर भरोसा बनाकर, परमेश्वर की योजना के अनुसार अपने रिश्तों और जिम्मेदारियों को निभाएं। कठिन निर्णयों में प्रेम और सम्मान के साथ कदम उठाने से रास्ते खुलते हैं।
संक्षिप्त सार
रूत 1:8 नाओमी की करुणा और व्यवहार की भाषा को प्रस्तुत करता है—परमेश्वर की कृपा पर निर्भर रहते हुए बहुओं को उनके घर लौटने का आग्रह। यह पाठ यह निर्देश देता है कि संकट के समय भी विश्वास, सम्मान और प्रेम हमारे जीवन की दिशा निर्धारित कर सकते हैं।
क्रॉस-रेफरेंसेज़ और संक्षिप्त व्याख्या
1) यहूदियों के कठिन समय में परिवारों के प्रति निष्ठा—परमेश्वर की योजना की दिशा को समझना। यह दर्शाता है कि कैसे व्यक्तिगत निर्णय सत्संग और सामाजिक उत्तरदायित्व पर असर डालते हैं।
2) नाओमी का आह्वान—आत्मिक निर्भरता और दया की ग़राई में बहनों के लिए सुरक्षित मार्ग बनना।
3) अनुभव से प्रेरित विश्वास—सम्बन्ध, मार्गदर्शन और ध्यान से आगे की यात्रा तय होती है।
उद्धरण नोट: इस पाठ के लिए Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के प्रकाशित टिप्पणियों में से आवश्यकतानुसार संक्षिप्त उद्धरण केवल तभी प्रस्तुत किए गए हैं जब वे उपलब्ध हों।