Old Testament
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जकर्याह 7:2 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
बेतेलवासियों ने शरेसेर और रेगेम्मेलेक को इसलिए भेजा था कि यहोवा से विनती करें,
जकर्याह 7:2 पद-दर-पद बाइबल टीका
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जकर्याह 7:2 समानांतर पद और संबंधित वचन
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जकर्याह 8:21 (HINIRV) »
और एक नगर के रहनेवाले दूसरे नगर के रहनेवालों के पास जाकर कहेंगे, 'यहोवा से विनती करने और सेनाओं के यहोवा को ढूँढ़ने के लिये चलो; मैं भी चलूँगा।'

यिर्मयाह 26:19 (HINIRV) »
क्या यहूदा के राजा हिजकिय्याह ने या किसी यहूदी ने उसको कहीं मरवा डाला? क्या उस राजा ने यहोवा का भय न माना ओर उससे विनती न की? तब यहोवा ने जो विपत्ति उन पर डालने के लिये कहा था, उसके विषय क्या वह न पछताया? ऐसा करके हम अपने प्राणों की बड़ी हानि करेंगे।”

1 राजाओं 13:6 (HINIRV) »
तब राजा ने परमेश्वर के जन से कहा, “अपने परमेश्वर यहोवा को मना और मेरे लिये प्रार्थना कर, कि मेरा हाथ ज्यों का त्यों हो जाए!” तब परमेश्वर के जन ने यहोवा को मनाया और राजा का हाथ फिर ज्यों का त्यों हो गया।
अर्थ का संक्षेप
यहोवा के हिरण-परिषद के कारण यहूदी जातियों के धार्मिक कदम-कदम पर असर पड़ता है। जकर्याह 7:2 में बताया गया है कि बेतेल के निवासी शरेसेर और रेगेम्मेलेक को भेजकर विनती करने का निर्देश दिया गया था, ताकि वे यहोवा की इच्छा समझ सकें और शास्त्रमनुकूल निर्णय ले सकें। यह उद्धार के कड़ी की ओर संकेत है कि बाहर से मिलने वाली सलाह या दूतावास भी परमेश्वर के निर्देशों के अनुरूप होनी चाहिए, न कि मात्र दिखावा या युक्ति।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यहोवा ने भविष्यवाणी के रूप में यहूदियों को संबोधित किया, जब वे लौटकर यहूदियों के राज्य की पुनःस्थापना कर रहे थे। बेतेल, शहर के धार्मिक-यात्रा और पूजा से जुड़ा प्रमुख स्थान रहा है; शरेसेर और रेगेम्मेलेक एक अनुचित-परामर्श के प्रतीक माने जाते हैं—जो यहूदी-समुदाय के भीतर धार्मिक संस्थाओं के साथ जुड़कर अपराध या अक्षम विनिमय के संकेत दे सकते थे। यहाँ संदेश यह है कि जब परलोक-सम्बन्धी बातें उठें, तब यह स्पष्ट हो कि परमेश्वर की अनुमति से ही आगे बढ़ना चाहिए, न कि दूसरों के राजनीतिक या सामाजिक दबाव से।
व्याख्यात्मक अवलोकन
मुख्य विचार का संकलन
अन्य पदों से सम्बद्धता
1) प्रचार-ओर परामर्श की सतर्कता: भाती हुई सलाह से पहले परमेश्वर की इच्छा पूछना जरूरी है; यह थीम अन्य भविष्यवाणी-ग्रंथों में भी मिलता है कि परमेश्वर की राह ही सुरक्षित राह है।
2) आस्था और कर्म का संतुलन: विश्वास के साथ व्यवहार और कर्म भी मेल खाते हों, ताकि रीति-रिवाज सिर्फ दिखावा न बन जाए।
व्यावहारिक निष्कर्ष
हमारे जीवन में भी बारंबार ऐसी स्थिति आती है जहाँ बाहरी दबाव और राजनीतिक-धार्मिक परामर्श से निर्णय करने पड़ते हैं। इस वचन से शिक्षा मिलती है कि हम परमेश्वर के निर्देशों को पहले रखें, उनकी खोज में विनती करें, और भीतर की सत्य-सत्यता के साथ व्यवहार करें।
सेना-बंधु संदर्भ
- हिन.Abrahamic-धार्मिक परामर्श के बारे में अन्य संदर्भ—परमेश्वर के निर्देशों की पवित्रता पर बल
- 1) यहूदा की वापसी और पूजा-निर्माण की प्रेरणा पर जोर
- 2) सत्य और रीति-रिवाज में अंतर को समझना
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