Old Testament
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जकर्याह 7:5 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
“सब साधारण लोगों से और याजकों से कह, कि जब तुम इन सत्तर वर्षों के बीच पाँचवें और सातवें महीनों में उपवास और विलाप करते थे*, तब क्या तुम सचमुच मेरे ही लिये उपवास करते थे?
जकर्याह 7:5 पद-दर-पद बाइबल टीका
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जकर्याह 7:5 समानांतर पद और संबंधित वचन
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जकर्याह 1:12 (HINIRV) »
तब यहोवा के दूत ने कहा, 'हे सेनाओं के यहोवा, तू जो यरूशलेम और यहूदा के नगरों पर सत्तर वर्ष से क्रोधित है, इसलिए तू उन पर कब तक दया न करेगा?' (प्रका. 6:10)

यशायाह 58:4 (HINIRV) »
सुनो, तुम्हारे उपवास का फल यह होता है कि तुम आपस में लड़ते और झगड़ते और दुष्टता से घूँसे मारते हो। जैसा उपवास तुम आजकल रखते हो, उससे तुम्हारी प्रार्थना ऊपर नहीं सुनाई देगी।

यशायाह 1:11 (HINIRV) »
यहोवा यह कहता है, “तुम्हारे बहुत से मेलबलि मेरे किस काम के हैं? मैं तो मेढ़ों के होमबलियों से और पाले हुए पशुओं की चर्बी से अघा गया हूँ; मैं बछड़ों या भेड़ के बच्चों या बकरों के लहू से प्रसन्न नहीं होता।
जकर्याह 7:5 का संदर्भ और उसका अर्थ
स्थिति का परिचय: यह घटना उस समय की है जब यहूदा के लोग पवित्र मंदिर के पुनर्निर्माण के बाद भी पुराने अनुष्ठानों और उपवासों की परंपरा की तीव्रता को समझ रहे थे। याजकों और सामान्य लोगों से ईश्वर यह कहने को कहते हैं कि सत्तर वर्षों के भीतर पाँचवें और सातवें महीनों के उपवास और विलाप का वास्तविक उद्देश्य क्या था—क्या वे केवल परंपरा के अनुसार कर रहे थे या उनके हृदय में परमेश्वर की प्रतिष्ठा थी?
पाठ से जो धार्मिक संदेश उभरता है
1) दृश्य-आधारित तप से परमेश्वर तक पहुँच संभवता नहीं: “तब क्या तुम सचमुच मेरे ही लिये उपवास करते थे?” यह सवाल उपासना की वास्तविक स्थिति को तलाशता है—क्या उपवास और विलाप भीतर से प्रेरित थे या सिर्फ धार्मिक रूढ़ि के कारण?
2) हृदय की नीयत पर जोर: परमेश्वर यह दिखलाते हैं कि आडंबर और बाह्य क्रियाओं के पीछे हृदय की उन्मुखीकरण जरूरी है। उपवास का उद्देश्य ईश्वर के साथ संबंध और आज्ञापालन होना चाहिए, न कि सामाजिक मान-सम्मान या दिखावे के लिए.
3) धार्मिक दृष्टिकोण में बदलते संकेत: पूर्वकालीन उपवासोष्ठी में परंपरा निभाने से अधिक, लेख स्पष्ट करता है कि भक्ति के पीछे एक सचेत परिवर्तन और निष्कपटता चाहिए। यह संदेश आज भी प्रासंगिक है—हम किन कारणों से परमेश्वर के सामने आते हैं?
संशोधित शब्दों और चित्रों की व्याख्या
• उपवास: यहाँ सामान्य मानव-योजना के अनुसार नियमबद्ध उपवास को नहीं, बल्कि आत्म-नियमन और पवित्रता के लिए परमेश्वर की ओर लौटने की प्रक्रिया के रूप में विचार किया गया है।
• सत्तर वर्ष: यह समय के संकेत के रूप में प्रतीकात्मक है, जिस में ईश्वर की योजना और रीति-रिवाजों के पुनःस्थापन का संदर्भ है।
अन्य संबंधित पाठ
• हिब्रू पवित्रता और आहुति पर कहे गए यशयाह और एजाज़ के संदेश—पर्याप्त आचरण बिना धर्म-चलन नहीं बन सकता।
•हरूले परमेश्वर के साथ सत्यपूर्ण अनुशीलन का संदेश दिखाने वाले अन्य धर्मग्रंथ: अंतःकरण की ईमानदारी से पूजा सर्वोपरि है।
Cross-reference notes (संक्षेप):
आज के लिए अनुप्रयोग
हम भी ऐसे उपवास करें जो केवल रीति-रिवाज न बनकर हमारे हृदय की गहराई से परमेश्वर की उपस्थिति को seek करें। आधे-तैयार कर्म नहीं, बल्कि निष्कपट आत्म-विश्वास और दूसरों के लिए न्याय और दया को प्रदर्शन करें। उपवास का मूल उद्देश्य परमेश्वर के अनुरूप जीवन जीना और उसकी इच्छा को मानना है, न कि सामाजिक मान्यता पाने के लिए।
कुंजी उद्धरण (महत्वपूर्ण टिप्पणीकारों के सीधे शब्द नहीं, संक्षेप में संकेत)
• मैथ्यू हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के कुछ विचारों का समेकित निष्कर्ष यह बताता है कि धार्मिक क्रियाओं के पीछे हृदय की प्रामाणिकता आवश्यक है; अगर हृदय में विश्वास और आदर्श नहीं है, तो outward rituals का परिणाम शून्य हो सकता है।
संक्षिप्त क्रॉस-रेफरेंस
• हिब्रू संचय में उपवास के उद्देश्य पर केंद्रित पाठ; • पुराने नियम के रीति-रिवाज और उनकी सत्यता पर पुनर्मूल्यांकन विषयक elsewhere; • नए नियम में आत्म-समर्पण और ईश्वर के स्वागत की प्रतिबद्धता का महत्व।
निष्कर्ष: यह पाठ हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर उपवास और विलाप में भी हृदय की नीयत देखता है। बाह्य क्रिया नहीं, बल्कि आंतरिक परिवर्तन ही ईश्वर की दृष्टि में सच्चा worship है.