Old Testament
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जकर्याह 7:3 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
और सेनाओं के यहोवा के भवन के याजकों से और भविष्यद्वक्ताओं से भी यह पूछें, “क्या हमें उपवास करके रोना चाहिये जैसे कि कितने वर्षों से हम पाँचवें महीने में करते आए हैं?”
जकर्याह 7:3 पद-दर-पद बाइबल टीका
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जकर्याह 7:3 समानांतर पद और संबंधित वचन
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जकर्याह 8:19 (HINIRV) »
“सेनाओं का यहोवा यह कहता है: चौथे, पाँचवें, सातवें और दसवें महीने में जो-जो उपवास के दिन होते हैं, वे यहूदा के घराने के लिये हर्ष और आनन्द और उत्सव के पर्वों के दिन हो जाएँगे; इसलिए अब तुम सच्चाई और मेलमिलाप से प्रीति रखो।

याकूब 4:8 (HINIRV) »
परमेश्वर के निकट आओ, तो वह भी तुम्हारे निकट आएगा: हे पापियों, अपने हाथ शुद्ध करो; और हे दुचित्ते लोगों अपने हृदय को पवित्र करो। (जक. 1:3, मला. 3:7)

मलाकी 2:7 (HINIRV) »
क्योंकि याजक को चाहिये कि वह अपने होंठों से ज्ञान की रक्षा करे, और लोग उसके मुँह से व्यवस्था पूछें, क्योंकि वह सेनाओं के यहोवा का दूत है।
जकर्याह 7:3 का अर्थ
यह पाठ कहता है: सेनाओं के यहोवा के भवन के याजकों से और भविष्यद्वक्ताओं से यह पूछा जाए, क्या हमें उपवास करके रोना चाहिये जैसे कि कितने वर्षों से हम पाँचवें महीने में करते आए हैं?
pDear context (संदर्भभूमि)
यशायाह के समय के बाद, यहूदा लौट आया था और मंदिर निर्माण की परियोजना ने उन्हें निरुत्साहित किया था। रुजहाँ यही है कि उपवास और रोना एक समय-सीमा में आम तौर पर आस्था और विनति के रूप में किए जाते थे। इस परिवेश में पुनीतता और आध्यात्मिक उद्देश्य के बजाय विपरीत समय पर आडंबर, और नियम-पालन की बाह्यता बढ़ती प्रतीत होती थी। इस verse में ईश्वर चाहता है कि याजक और भविष्यद्वक्ता स्पष्ट रूप से बताएं कि धार्मिक परंपरा का बाहरी प्रदर्शन कितना उचित है, जब जीवन के वास्तविक उद्देश्य और नैतिक परिवर्तन नहीं दिखते।
व्याख्यात्मक अवलोकन
मुख्य विचार
अन्य सन्दर्भ और उनके अर्थ
• हबक्कूक 2:2-3 से सीख: पवित्र उद्देश्य स्पष्ट লিখ, और समय-सीमा निर्धारित कर। यह दर्शाता है कि ईश्वर स्मरणीय और स्पष्ट संदेश चाहता है ताकि लोग कदम उठाएं।
• मसीह के आगमन से पहले के उपवासों का संघर्ष: बाह्य उपवास से आन्तरिक परिवर्तन की मांग, जो धर्म और करुणा के मेल से स्थिर हो।
• यहूदियों के भविष्य के उत्सवों और आचार-विचार में पुनर्गठन: केवल परंपरागत आचरण नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय, सहायता और ईश्वर-भक्ति का संतुलन आवश्यक है।
मैथ्यू हेनरी/बार्न्स/एडम क्लार्क से संक्षेप उद्धरण
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“जो कर्मशालाओं में लगे रहते हैं, वे शायद बाह्य रीति-रिवाज के लिए उपवास करते हैं, परन्तु दिल की अदालत में नहीं।” (A. Clarke)
“हमारी धार्मिक क्रियाओं का मूल्य उस समय बढ़ता है जब हमारा व्यक्तिगत व्यवहार भी न्यायपूर्ण और दयालु हो।’ (Matthew Henry, paraphrase)
संकेत-वाक्य और मुख्य संदेश
इस वचन का संदेश यह है कि धार्मिक उपवास और अन्य बाहरी रीति-रिवाज अभी भी महत्वपूर्ण हो सकते हैं, परन्तु वे तब तक अर्थहीन हैं जब दिल और समाज में वास्तविक परिवर्तन नहीं आता। यदि उपवास केवल आडंबर है, तो परमेश्वर उसे अस्वीकृत कर देता है। यहूदी समुदाय को यह याद दिलाया गया कि आध्यात्मिक जाँच के साथ सामाजिक न्याय, करुणा और नैतिकता को भी उन्नत करना चाहिए।
व्यावहारिक takeaway
परिवर्त की यही माँग यहूदियों के समय से आज तक है: धर्म का वास्तविक परिक्षण वह है जिसमें हमारी आस्था के अनुरूप व्यवहार भी बदले जाते हैं।