Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीजकर्याह 7:4 बाइबल पद की व्याख्या
जकर्याह 7:4 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
तब सेनाओं के यहोवा का यह वचन मेरे पास पहुँचा;
जकर्याह 7:4 पद-दर-पद बाइबल टीका
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जकर्याह 7:4 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यशायाह 10:16 (HINIRV) »
इस कारण प्रभु अर्थात् सेनाओं का प्रभु उस राजा के हष्टपुष्ट योद्धाओं को दुबला कर देगा, और उसके ऐश्वर्य के नीचे आग की सी जलन* होगी।
जकरyah 7:4 — उस वचन की संकल्पना और समय
इस वचन का मूल आशय यह है कि यहोवा सेनाओं के परमेश्वर ने सीधे तौर पर संवाद किया है; यह दर्शाता है कि धार्मिक उपेक्षा और बाह्य रुकावटें गहरी नैतिक और आध्यात्मिक जाँच से टकराती हैं। पवित्र नगर के लोग थके-हारे समय में एक बार फिर से विचार करें: ईश्वर के दिल से निकला यह वचन उनके व्यवहार और धर्मस्थापन के बारे में है, न कि बाहरी रीति-रिवाजों के प्रदर्शन के बारे में בלבד।
साहित्यिक संदर्भ (कथाक्रम/संदर्भ)
यहेह 7 के पहले अध्यायों में यहूदियों की पौन-अपेक्षा और तुच्छ धार्मिक औपचारिकताओं के बारे में उद्धृत चेतावनियाँ मिलती हैं; यहाँ भी यहोवा स्वयं बोलते हैं कि उनके द्वारा किया गया उपवास मात्र औपचारिक है जब वे अन्याय, अधर्म और असत्य पर टिके रहते हैं। यह पाठ यह दर्शाता है कि वास्तविक धार्मिकता हृदय परिवर्तन और न्याय के कार्यों से मापी जाती है, न कि बाह्य रीतियों से।
थियोलॉजिकल महत्व
यह वचन यहोवा के समय-निर्देशन और नैतिक सत्ता को उजागर करता है। धार्मिक गतिविधियाँ तब मान्य मानी जाती हैं जब वे सामाजिक न्याय, अनाथ-वंचितों की सहायता और भ्र्ष्टाचार के विरुद्ध कदमों के साथ जुड़ी हों। परमेश्वर रूढ़िगत पवित्रताओं के पीछे नहीं भागते; वे उन दिलों की ईमानदारी चाहते हैं जो प्रेम और न्याय को व्यवहार में लाते हैं।
पवित्र लेखन-सेतु (Cross-references)
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि हर प्रकार की धार्मिक व्यवस्था तब सच्ची बनती है जब वह न्याय और दयालुता के साथ जीवन में व्यक्त होती है।
आत्मिक विचार (Questions for reflection)
संक्षिप्त निष्कर्ष
इस वचन में परमेश्वर का समाज के साथ लैस-व्यवहार पर जोर है: वह उपवास और धार्मिक क्रिया केवल तब सार्थक हैं जब वे दायित्वपूर्ण जीवन के साथ जुड़ी हों—न्याय, प्रेम और सत्य के निर्माण में साक्षी बनें। यदि उपासना से भेदभाव, अन्याय या भुलावे बढ़ते हैं, तो वह परमेश्वर के यहाँ उचित नहीं ठहरती।
मौजूद उद्धरण (एवन प्रमुख टिप्पणीकारों से)
यहाँ सेालीय संदर्भों में प्रसिद्ध टिप्पणियाँ आती हैं। अगर उपयुक्त मंजूरी मिलती है, तो Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संबंधित उद्धरण संक्षेप में जोड़े जा सकते हैं, परन्तु पूर्ण पाठ नहीं दिया गया है।