Old Testament
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जकर्याह 7:6 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
और जब तुम खाते पीते हो, तो क्या तुम अपने ही लिये नहीं खाते, और क्या तुम अपने ही लिये नहीं पीते हो?
जकर्याह 7:6 पद-दर-पद बाइबल टीका
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जकर्याह 7:6 समानांतर पद और संबंधित वचन
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व्यवस्थाविवरण 14:26 (HINIRV) »
और वहाँ गाय-बैल, या भेड़-बकरी, या दाखमधु, या मदिरा, या किसी भाँति की वस्तु क्यों न हो, जो तेरा जी चाहे, उसे उसी रुपये से मोल लेकर अपने घराने समेत अपने परमेश्वर यहोवा के सामने खाकर आनन्द करना।

व्यवस्थाविवरण 12:7 (HINIRV) »
और वहीं तुम अपने परमेश्वर यहोवा के सामने भोजन करना, और अपने-अपने घराने समेत उन सब कामों पर, जिनमें तुमने हाथ लगाया हो, और जिन पर तुम्हारे परमेश्वर यहोवा की आशीष मिली हो, आनन्द करना।

जकर्या 7:6 का प्राथमिक अर्थ
यह वाक्य यह बताता है कि उपवास या धार्मिक रीति-रिवाज के भीतर भी हमारा केंद्रित ध्यान ईश्वर के शुद्ध adjournment से नहीं, बल्कि अपने ही लाभ-लाभ के अनुरोध पर है। सरल शब्दों में: जब लोग उपवास के समय भोजन-पीने के कारण अपना हित देखते हैं, तो उनका आंतरिक मन परमेश्वर के साथ मेल नहीं खा रहा होता।
पृष्ठभूमि और सन्दर्भ
इस दखल के समय यहूदियों ने उपवास करते समय अपने दायित्वों और धार्मिक परंपराओं पर विचार किया। हिब्रू प्रचार में उपवास के समय लोग अक्सर संयम का प्रदर्शन करते, परन्तु यथार्थ में सामाजिक एवं आर्थिक उत्तरदायित्व से टकराते थे। युक्तियाँ यह बताती हैं कि भक्ति केवल बाहरी क्रियाओं पर नहीं, बल्कि जीवन के समग्र व्यवहार पर निर्भर है।
व्याख्या के निहित बिंदु
थीमेटिक सारांश
अन्य पुस्तकों से सम्बद्ध भाग
प्रेरणा के लिए कुछ संदर्भ: निर्माण 绝, दाऊद की कृपा-याचना और नीतिवचन में न्याय की आवाज़, जहां आचरण का वास्तविक परीक्षण बाहर के पवित्र कार्यक्रमों से अधिक भीतर के परिवर्तन में है।
संयुक्त टिप्पणी और व्यावहारिक निष्कर्ष
जकर्या 7:6 हमें याद दिलाता है कि उपवास या धार्मिकियाँ केवल बाह्य क्रियाएं नहीं होनी चाहिए; वे हमारे जीवन के बाकी हिस्सों के साथ एकीकृत होनी चाहिए—खासकर भोजन, धन, और सामाजिक दायित्वों के बीच। Matthew Henry, Albert Barnes, और Adam Clarke द्वारा उद्धृत सार उनका कहन यही है कि धर्मिता को आकाशीय सम्मान तब तक नहीं मिल सकता जब हमारा भूखा-लाभकारी स्वार्थ किसी अन्य व्यक्ति के अधिकारों को दबा दे।
cross-reference 1: यशायाह 58:6-7—स्वार्थ नहीं, बल्कि उपवास वह है जो बन्धनों को खोल दे, दास-गति को मुक्त करे, और किसी गरीब के साथ समान व्यवहार बनाए।
cross-reference 2: मत्ती 6:1-4—नम्रता के साथ दीक्षित दान ताकि भीड़ के सामने प्रशंसा न मिले, बल्कि आकाश तक पहुँचने वाला सत्य बना रहे।
cross-reference 3: याकूब 2:14-17—विश्वास के साथ कर्मों की जरूरत; मात्र विश्वास से ही समाज में क्रिया-उत्पादन नहीं होता, यह दिखना चाहिए कि हमारे व्यवहार में परिणाम हैं।
निष्कर्षतः, हमें उपवास और धार्मिक गतिविधियों को ऐसे जीवन-शैली बनाकर देखना चाहिए जो अन्य लोगों की भलाई और न्याय के साथ गठजोड़ बनाते हैं—ताकि हमारे आचरण से ईश्वर की महिमा स्पष्ट हो।