Old Testament
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जकर्याह 7:13 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
सेनाओं के यहोवा का यही वचन है, “जैसे मेरे पुकारने पर उन्होंने नहीं सुना, वैसे ही उसके पुकारने पर मैं भी न सुनूँगा;
जकर्याह 7:13 पद-दर-पद बाइबल टीका
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जकर्याह 7:13 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यिर्मयाह 14:12 (HINIRV) »
चाहे वे उपवास भी करें, तो भी मैं इनकी दुहाई न सुनूँगा, और चाहे वे होमबलि और अन्नबलि चढ़ाएँ, तो भी मैं उनसे प्रसन्न न होऊँगा; मैं तलवार, अकाल और मरी* के द्वारा इनका अन्त कर डालूँगा।” (यहे. 8:18)

नीतिवचन 1:24 (HINIRV) »
मैंने तो पुकारा परन्तु तुम ने इन्कार किया, और मैंने हाथ फैलाया, परन्तु किसी ने ध्यान न दिया,

यशायाह 1:15 (HINIRV) »
जब तुम मेरी ओर हाथ फैलाओ, तब मैं तुम से मुख फेर लूँगा; तुम कितनी ही प्रार्थना क्यों न करो, तो भी मैं तुम्हारी न सुनूँगा; क्योंकि तुम्हारे हाथ खून से भरे हैं। (नीति. 1:28, मीका. 3:4)
क्यों यह वचन महत्व रखता है
यह वचन यह स्मरण कराता है कि परमेश्वर की चेतावनियाँ और बुलाहटें केवल एक बार नहीं टिकतीं; जब लोग बार‑बार इनकार करते हैं, तब ईश्वर की गंभीरता और उदारता दोनों पर प्रश्न उठते हैं। जकर्याह के समय यह संदेश राष्ट्रीय आत्म-संहार के खतरे के बीच एक चेतावनी था कि धार्मिक धार्मिकता और उत्तम भाव के अभाव में परमेश्वर की सहायता सीमित हो सकती है। यह पाठ संपूर्ण भविष्यवाणी के क्रम में एक नाजुक मोड़ है, जहाँ अल्पकालिक असहायता पर सच्चे पथ पर लौटने का आह्वान दिया गया है।
पुष्टि: मूल संदर्भ और संदेश
यहोवा के संदेशवाहक के रूप में एलेम और यहूदियों के बीच एक बार‑बार की गई साधना-निंदा के प्रसंग में यह चेतावनी दी गई: जैसे उन्होंने मेरे बुलावे पर इन्कार किया, वैसे ही मैं भी उनकी पुकार पर नहीं सुनूंगा। यह सिर्फ एक दायित्वहीन स्वीकृति नहीं, बल्कि एक विनम्र चेतावनी है कि परमेश्वर के आह्वान पर अवहेलना के गंभीर परिणाम होते हैं।
महत्वपूर्ण संदेश का सार
1) जवाबदेही: लोग स्वयं अपने पथ चुनते हैं, पर परमेश्वर कभी‑कभी अपने उपदेशों को अनसुना कर बैठे रहने पर भी, लोगों को उनके कर्मों के अनुभवों में जवाब देता है।
2) चेतावनी बनाम अवसर: यह वचन एक चेतावनी है कि अवसर कभी समाप्त नहीं होते; परन्तु बार‑बार के इन्कार से अवसर घट सकता है।
3) दया और न्याय का संतुलन: न्याय के साथ दया का भी संकेत है—यदि लोग पश्चात्ताप करें, तो ईश्वर असमर्थ नहीं रहते; पर लगातार अवहेलना में सीमा आ जाती है।
पवित्र ग्रंथ के अन्य स्थानों से सम्बन्ध
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि पुकार पर प्रतिक्रिया का क्रम सीधे‑सीधे लोगों के निर्णय पर निर्भर है, और यह निर्णय ईश्वर की क्रिया को प्रभावित कर सकता है।
एंट्रीविन्ड (Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke) से संक्षिप्त दृष्टिकोण
इस पाठ पर चिंतन करते समय ये प्रसिद्ध पवित्र-विवेचनकर्ता इस बात को प्रकाश में लाते हैं कि परमेश्वर की आवाज़ का बार‑बार इनकार करना समाज की नैतिक रीढ़ को कमजोर कर देता है। वे यह मानते हैं कि यह चेतावनी यह संकेत है कि परमेश्वर अपने लोगों के साथ उनके अतीत के साथ दोहराव करते हुए भी सच्ची पश्चाताप की मांग करता है—पर यदि वही प्रवृत्ति बनी रहती है, तो परिणाम भी स्पष्ट होते हैं।
यद्यपि मैं व्यक्तिगत उद्धरण सीधे उद्धृत नहीं कर रहा, पर इन टिप्पणीकारों के विचारों का संयोजन इस प्रकार रहा है: पुकार पर प्रतिक्रिया नगण्यता या अवहेलना परमेश्वर की सुनवाई को कम कर देती है; और जब दया के अवसर तंग हो जाते हैं, तब लोगों को पश्चाताप के लिए प्रेरित करना कठिन हो सकता है।
छोटा‑सा स्वयं‑क्रिया-नोट (Cross-references with brief explanations)
इन दृष्टांतों से यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर की ओर लौटने के अवसर कभी-कभी सीमित होते हैं, परन्तु पूर्णतया समाप्त नहीं होते।
आखिरी devotional विचार
हम में से प्रत्येक अपने जीवन को पुनः बेझिझक चेक करे: क्या हमने ईश्वर के बुलावे पर कभी नज़रअंदाज किया है? अगर हाँ, तो स्मरण रहे कि परमेश्वर का बुलावा उदार है, पर हमारी प्रतिक्रिया भी निर्णायक है। लौट आकर भरोसा, पश्चाताप और सत्यनिष्ठा को अपनाएं; तब परमेश्वर की करुणा और सहायता सुरक्षित रूप से हमारे साथ हो सकती है।