Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
1 शमूएल 1 1 शमूएल 2 1 शमूएल 3 1 शमूएल 4 1 शमूएल 5 1 शमूएल 6 1 शमूएल 7 1 शमूएल 8 1 शमूएल 9 1 शमूएल 10 1 शमूएल 11 1 शमूएल 12 1 शमूएल 13 1 शमूएल 14 1 शमूएल 15 1 शमूएल 16 1 शमूएल 17 1 शमूएल 18 1 शमूएल 19 1 शमूएल 20 1 शमूएल 21 1 शमूएल 22 1 शमूएल 23 1 शमूएल 24 1 शमूएल 25 1 शमूएल 26 1 शमूएल 27 1 शमूएल 28 1 शमूएल 29 1 शमूएल 30 1 शमूएल 31



1 शमूएल 3:14 पर टिप्पणी — संदर्भ और मर्म
इस वचन का संदर्भ प्रेषित वर्षों के दौरान यहूदियों के लिए एक चेतावनीात्मक संकेत है कि परमेश्वर ने हब्बी-घोषणा के विरुद्ध किसी प्रकार की प्रत्यक्ष प्रतिशोध से नहीं बचना। जब दाऊदियों के समय तक इस्राइल के आराधन और आरक वास्तु के बीच अजीब-सी भ्रष्टाचार बढ़ गया, तब यहूदियों के परमेश्वर ने ऐल के घराने के अधर्म के बारे में एक स्पष्ट शपथ दी। यहाँ कहा गया है कि ऐली के घराने के अधर्म का प्रायश्चित न मेलबलि से होगा, न अन्नबलि से। इसका तात्पर्य यह है कि उनके दौरान वयस्क अवरोध और अविश्वास के कारण ईश्वर ने दण्ड दिया और शपथ के अनुसार उनके कर्मों का प्रभाव उठ गया।
केंद्रीय अर्थ
यह वचन दिखाता है कि परमेश्वर का निर्णय सच्चा और स्थायी है: कुछ पापों के लिए चुकाने के उपाय केवल बलिदान नहीं हैं, जब हृदय-परिवर्तन और पाप के विरुद्ध गवाही नहीं होती। ऐली के घराने के अधर्म का उल्लेख मूलतः पतित नेतृत्व और धार्मिक भ्रष्टाचार से जुड़ा है—यानी इस पवित्र कार्यालय का तिरस्कार और बाबा-शासन का आचरण जो ईश्वर के ज्ञान के विपरीत था। इसलिए प्रायश्चित के उपाय भी यदि भौतिक विधि तक सीमित रहें, तो वे प्रभावी नहीं होते।
मुख्य विषय
संबद्ध आयतें और भावना
यहाँ के सिद्धांत निकट-परिचित पूर्ववर्त्तन से मेल खाते हैं—यहोवा के न्याय और कृपा, और पाप के गंभीर परिणाम। जैसे अन्य स्थलों पर जब लोगों ने बलिदान से संतुष्टि खोजी, परन्तु हृदय में अविद्या और अविश्वास बना रहा, तब ईश्वर ने स्पष्ट किया कि बलिदान केवल रूप नहीं हो सकता जब उसका जीवन-उद्धार नहीं होता।
व्यावहारिक चिंतन
हम अपने समय के प्रार्थना-जीवन में यह देख सकते हैं कि धार्मिक कर्म का आकर्षण कभी भी हृदय-प्रतिष्ठान की कमी को नहीं मिटा सकता। यदि हम अपनी आस्थाओं में आचरण और निज-परिवर्तन पर ध्यान नहीं देते, तो ‘बलिदान’ भी खाली हो सकता है। प्रेरणा यह है कि व्यक्तिगत परीक्षा और पाप पर सचेत प्रतिक्रिया हमारे संवाद-आधारित जीवन में आवश्यक है—खासकर तीन क्षेत्रों में: - नेतृत्व-निर्णय में सत्य और धर्म-सुनियंत्रण बनाए रखना - धार्मिक गतिविधियों की गहराई में निष्ठा और नवजीवन - समुदाय के भीतर निष्कपट आचरण की स्थापना
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप)
1) 1 समूएल 2:12-17 — उच्चाधिकारियों के अधर्म और बाल हत्या-like गतिविधियों के कारण ईश्वर की अनुभूति में कमी। छोटे-छोटे उल्लंघनों के बावजूद पवित्रता का नुकसान।
2) 2 समूएल 7:14-15 — परमेश्वर के साधनों के प्रतिशोध के समय, हृदय परिवर्तन की महत्त्वपूर्ण आवश्यकता।
3) होशे 6:6 — “मैं क्रोध नहीं चाहता बलिदान” जैसी विचारधारा, जिसमें स्थाई प्रेम और ज्ञान अधिक मूल्यवान है।
संक्षिप्त समापन
1 शमूएल 3:14 हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर की सच्चाई Ritualistic कर्म से ऊपर है। ऐली के घराने के केस में, अधर्म के साथ बलिदान भी असरहीन हो गया; यह हमें आस्था के भीतर निष्ठा, नेतृत्व की जिम्मेदारी, और पाप के विरुद्ध निरंतर संघर्ष के लिए प्रेरित करता है।
सूचियाँ दी गई पर्व-नोट
ध्यान देने योग्य तथ्य: बलिदान से अधिक, हृदय-परिवर्तन और धार्मिक नैतिकता की स्थिरता परमेश्वर के अनुग्रह को बनाए रखने की चाबी है।
यह टिप्पणी Matthew Henry, Albert Barnes, और Adam Clarke के सार्वजनिक-डোমेन टिप्पणी-टिप्पणियों के संयुक्त सार को सहज तरीके से हिंदी पाठक के लिए प्रस्तुत करती है, और इन में से किसी का भी ठीक-ठीक शाब्दिक अंश यदि उपलब्ध हो तो संक्षेप में उद्धृत किया गया है:
उद्धरण-संदर्भ: हैन्री, बार्न्स, और क्लार्क के सहायक विचारों की संयुक्त रचना—अनुशंसित पंक्तियों के लिए पाठ-प्रेरणा नीचे उद्धृत नहीं हैं बल्कि विचार-समुच्चय के रूप में समाहित हैं।