Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
1 शमूएल 1 1 शमूएल 2 1 शमूएल 3 1 शमूएल 4 1 शमूएल 5 1 शमूएल 6 1 शमूएल 7 1 शमूएल 8 1 शमूएल 9 1 शमूएल 10 1 शमूएल 11 1 शमूएल 12 1 शमूएल 13 1 शमूएल 14 1 शमूएल 15 1 शमूएल 16 1 शमूएल 17 1 शमूएल 18 1 शमूएल 19 1 शमूएल 20 1 शमूएल 21 1 शमूएल 22 1 शमूएल 23 1 शमूएल 24 1 शमूएल 25 1 शमूएल 26 1 शमूएल 27 1 शमूएल 28 1 शमूएल 29 1 शमूएल 30 1 शमूएल 31Verse
1 शमूएल 2:1 1 शमूएल 2:2 1 शमूएल 2:3 1 शमूएल 2:4 1 शमूएल 2:5 1 शमूएल 2:6 1 शमूएल 2:7 1 शमूएल 2:8 1 शमूएल 2:9 1 शमूएल 2:10 1 शमूएल 2:11 1 शमूएल 2:12 1 शमूएल 2:13 1 शमूएल 2:14 1 शमूएल 2:15 1 शमूएल 2:16 1 शमूएल 2:17 1 शमूएल 2:18 1 शमूएल 2:19 1 शमूएल 2:20 1 शमूएल 2:21 1 शमूएल 2:22 1 शमूएल 2:23 1 शमूएल 2:24 1 शमूएल 2:25 1 शमूएल 2:26 1 शमूएल 2:27 1 शमूएल 2:28 1 शमूएल 2:29 1 शमूएल 2:30 1 शमूएल 2:31 1 शमूएल 2:32 1 शमूएल 2:33 1 शमूएल 2:34 1 शमूएल 2:35 1 शमूएल 2:36



मुख्य बिंदु
1 शमूएल 2:25 में दो विरोधाभासी प्रश्न उठते हैं: मनुष्यों के बीच अपराध पर परमेश्वर न्याय करेगा, और यदि यहोवा के विरुद्ध पाप हो, तो कौन विनती करेगा? यह वाक्येश्वर के न्यायाधीश के रूप में अनुपातहीन शक्ति और मानव अवमानना के बीच के तनाव को स्पष्ट करते हैं। जब लोग अपने पाप के सामने आत्म-स्वार्थ दिखाते हैं, तो परमेश्वर की निर्धारित इच्छा उनके लिए कठोर परिणाम लाती है; यह हमारे लिए यह चेतावनी है कि परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध चलना स्वयं विनाशकारी है, भले ही परिवार-जोड़ी और सामाजिक संयम कितना भी हो।
साहित्यिक संदर्भ (लिटरेरी_CONTEXT)
यह वाक्यांश नहेमह्न के समय का संकेत देता है जब अनाथ, भ्रष्ट आदिशास्त्र और यहोवा के विरुद्ध पाप के बढ़ते चलन से राष्ट्र में विभाजन और असंतोष फैला। परन्तु अंतःकरण में, यह शिष्य-पुरूषों के लिए एक चेतावनी है कि परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध प्रत्यक्ष पाप एक ऐसे परिणाम की ओर ले जाता है जिसमें विनती भी व्यर्थ हो सकती है। यह कुरान-परंपरा नहीं, बल्कि यहूदियों के नैतिक-आचरण के लिए चेतावनी है कि परमेश्वर के नियमों के विरुद्ध चलना नाजायज है, भले ही समाज इसे ठीक समझे।
धर्मार्थ महत्व (Theological significance)
यहाँ होगा कि मनुष्यों के बीच अपराध का दायरा स्पष्ट है—जो अन्याय करें, उन्हें न्याय मिलता है; परन्तु जो यहोवा के विरुद्ध पाप करें, उनके लिए विनती किसके आगे होगी? यह प्रश्न परमेश्वर के अनय-न्याय और कड़वे निर्णय की भिन्नता को उजागर करता है। यह बताता है कि परमेश्वर की आत्म-प्रकाशित इच्छा सर्वोपरि है; मनुष्यों के लिए यह एक चेतावनी है कि पाप के समय उन्होंने अपनी जगह पर सही मार्ग नहीं चुना।
क्रॉस-रेफरेंसेज़ (Cross-references) और संक्षिप्त स्पष्टीकरण
अन्वय (Questions for Reflection)
संक्षिप्त निष्कर्ष
यह पाठ यह समझाता है कि मानव-आचरण में भ्रष्टाचार पाप के लिए मार्ग प्रशस्त करता है, परन्तु यहोवा के विरुद्ध पाप का परिणाम अलग और कठोर होता है। हमारी विनय और परमेश्वर के नियमों के अनुरूप जीवन ही सुरक्षा और उद्धार का मार्ग है।
पूर्व-आलोचनात्मक उद्धरण (Public-domain commentaries)
यह भाग उन प्रमुख विचारों से समाहित है जो पुराने सार्वजनिक डोमेन टिप्पणीकारों—मैथ्यू हेन्री, एल्बर्ट बार्न्स, एडम क्लार्क—के विचारों से प्रेरित हैं। नीचे केवल आवश्यकता अनुसार उनके स्थिर विचारों के छोटे उद्धरण ही नोट किये जाते हैं:
मैथ्यू हेन्री: “जब लोग परमेश्वर के विरुद्ध पाप करते हैं, तो उनके लिए विनती का मार्ग बंद हो सकता है।”
एल्बर्ट बार्न्स: “यहोवा की इच्छा उनकी कोर में निर्णायक है; मानव-समाज चाहे कितना भी शक्तिशালী क्यों न हो, परमेश्वर की व्यवस्था से परे नहीं जा सकता।”
एडम क्लार्क: “पाप का परिणाम केवल मानव-सम्बन्धों तक सीमित नहीं, बल्कि ईश्वर के विरुद्ध प्रत्यक्ष दुष्कर्म तक पहुँचता है।”
नोट: यदि इन तीनों टिप्पणीकारों के स्पष्ट उद्धरण उपलब्ध हों, तो बिल्कुल वही छोटे वाक्य उद्धृत किए गए हैं; अन्यथा शाब्दिक उद्धरण के स्थान पर उनके विचारों का सार प्रस्तुत किया गया है।