Old Testament
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यहोशू 11:20 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्योंकि यहोवा की जो मनसा थी, कि अपनी उस आज्ञा के अनुसार जो उसने मूसा को दी थी उन पर कुछ भी दया न करे; वरन् सत्यानाश कर डालें, इस कारण उसने उनके मन ऐसे कठोर कर दिए, कि उन्होंने इस्राएलियों का सामना करके उनसे युद्ध किया।।
यहोशू 11:20 पद-दर-पद बाइबल टीका
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यहोशू 11:20 समानांतर पद और संबंधित वचन
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रोमियों 9:18 (HINIRV) »
तो फिर, वह जिस पर चाहता है, उस पर दया करता है; और जिसे चाहता है, उसे कठोर कर देता है।

निर्गमन 4:21 (HINIRV) »
और यहोवा ने मूसा से कहा, “जब तू मिस्र में पहुँचे तब सावधान हो जाना, और जो चमत्कार मैंने तेरे वश में किए हैं उन सभी को फ़िरौन को दिखलाना; परन्तु मैं उसके मन को हठीला करूँगा, और वह मेरी प्रजा को जाने न देगा। (रोम. 9:18)

व्यवस्थाविवरण 20:16 (HINIRV) »
परन्तु जो नगर इन लोगों के हैं, जिनका अधिकारी तेरा परमेश्वर यहोवा तुझको ठहराने पर है, उनमें से किसी प्राणी को जीवित न रख छोड़ना*,
मुख्य व्याख्या बिंदु
यहोशू 11:20 कहता है कि परमेश्वर की यह आज्ञा थी कि कंकरमर्ग और दुष्ट नगरों पर भी दया न करे; नतीजे के तौर पर ईश्वरीय कठोरता ने हीसील से उनके मन को ऐसा बना दिया कि वे यहोशू की सेना के सामने आए और युद्ध में परास्त हुए। यहाँ स्पष्ट संदेश यह है कि परमेश्वर की न्याय-प्रणालियाँ समय-समय पर दया और क्रोध के बीच संतुलन बनाती हैं, ताकि हिंसा का निष्कर्ष ईश्वर के उद्देश्य-निर्वाण के अनुरूप हो।
पाठ-संदर्भीय पृष्ठभूमि
यहोशू के युद्ध-जगत में यह verse नबियों के समय के संदर्भ में यहूदियों की उस भूमि के कब्जे की योजना का भाग है, जहाँ मोशे की मित्रवत आदेशों के अनुसार संपूर्ण आक्रमण और दमन की प्रक्रिया चलती है। यह बताता है कि परमेश्वर ने अपनी पवित्र योजनाओं के लिए क्षेत्रीय रक्षात्मक और दमनकारी कदम उठाए, ताकि पवित्र भूमि पर बुराई का असर समाप्त किया जा सके।
धर्मशास्त्रीय महत्त्व
यह verse यह दिखाता है कि परमेश्वर की निर्णय-शक्ति और दया के साथ न्याय का संयोजन किस प्रकार चलता है। यहूदियों के लिए यह स्पष्ट संकेत है कि दया और कठोरता एक ही दिव्य सत्ता के अंतर्गत आती है, और मानव की समझ से परे वे दोनों एक साथ क्रिया-शक्ति बनाते हैं। ऐतिहासिक संदर्भ में यह भी दिखता है कि पाप के दुष्परिणाम कितने कठोर हो सकते हैं जब उसे पूर्ण रूप से ईश्वर के निर्देशों के अनुसार निष्पादन की आवश्यकता हो।
लेखन-पाठ एवं साहित्यिक संरचना
पद्यांश में "क्योंकि यहोवा की जो मनसा थी" एक निर्णायक, उद्धारक क्रिया के कारण का उद्घाटन करता है—युद्ध के भीतर ईश्वर की योजना का पूर्णत: पालन। सत्यानाश का शब्द जटिलता रखता है, क्योंकि यह सामूहिक रूप से उन लोगों के लिए है जो देश-धर्म के विरुद्ध चल रहे थे। कथा-लय में यह चक्र यह दर्शाता है कि उद्धारक इतिहास यहोवा के निर्देशों के अनुरूप बनता है, न कि मानवीय भावना के अनुकूल।
गंभीर प्रश्न व विचार
क्रॉस-रेफरेंसेस व उनसे जुड़ी बातें
1) नीतिवचन 16:4 में यह बताता है कि प्रभु सब कुछ अपने उद्देश्य के अनुसार करता; विचार करें कि कठोरता कब और क्यों आवश्य बनती है।
2) रोमियों 9:14-18 में पवित्र ग्रंथ कहता है कि ईश्वर के चयन में अधिकार है और वह दया देता है—यह विचार यहाँ संदर्भित घटना के दायरे में समझना मदद करता है।
3) यूहन्ना 3:36 में प्रत्यक्ष रूप से जीवन-नाश और अनंत जीवन की चयन-प्रक्रिया बताई गई है, जो परमेश्वर के न्याय और कृपा के संयोजन को उद्घाटित करती है।
पुनरावलोकन हेतु संक्षिप्त निष्कर्ष
यहोशू 11:20 हमें यह सिखाता है कि अत्यंत आवश्यकताओं के समय परमेश्वर की योजना दया और न्याय के साथ चलती है। यहूदी इतिहास में यह एक निर्णायक मोड़ है, जिसमें ध्वंस और उद्धार एक साथ दिखाई देते हैं। हमारे लिए यह प्रेरणा है कि हम परमेश्वर की पवित्रता और दया दोनों को मानें, और अपने जीवन में उसकी योजना के अनुसार कदम उठाने को तैयार रहें।
कथा-संदेश पर समर्थित आकलन
मत्ती-हेनरी, ऐल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के सामुदायिक विचारों का सार नीचे एक संयुक्त सार के रूप में प्रस्तुत है, ताकि पाठ की गहराई स्पष्ट हो:
Matthew Henry के अनुसार यह युद्ध-निर्णय परमेश्वर की पवित्र इच्छा के अनुरूप है, जहां दया का स्थान नहीं लिया गया है ताकि पाप का नाश हो।
Albert Barnes के अनुसार यहाँ ईश्वर का क्रोध और न्याय उस समय के इतिहास पर लागू होता है; इससे यह स्पष्ट होता है कि दया और न्याय एक साथ रहते हैं।
Adam Clarke के अनुसार यह दिखाता है कि ईश्वर की कठोरता का उद्देश्य मानव-युद्ध और पाप पर प्रभाव डालना है ताकि कुल मिलाकर उद्धार की योजना सुरक्षित रहे।
नोट: ऊपर उद्धृत विचारों के बिंदुवार शब्द-संदर्भ सीधे इस पाठ से संलग्न नहीं हैं, पर इन commentary-קהलेखों के सार से संगठित रूप में कुल मिलाकर यही स्थित है।