Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
निर्गमन 1 निर्गमन 2 निर्गमन 3 निर्गमन 4 निर्गमन 5 निर्गमन 6 निर्गमन 7 निर्गमन 8 निर्गमन 9 निर्गमन 10 निर्गमन 11 निर्गमन 12 निर्गमन 13 निर्गमन 14 निर्गमन 15 निर्गमन 16 निर्गमन 17 निर्गमन 18 निर्गमन 19 निर्गमन 20 निर्गमन 21 निर्गमन 22 निर्गमन 23 निर्गमन 24 निर्गमन 25 निर्गमन 26 निर्गमन 27 निर्गमन 28 निर्गमन 29 निर्गमन 30 निर्गमन 31 निर्गमन 32 निर्गमन 33 निर्गमन 34 निर्गमन 35 निर्गमन 36 निर्गमन 37 निर्गमन 38 निर्गमन 39 निर्गमन 40Verse
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निर्गमन 22:28 पर स्पष्ट अर्थ
इस वचन में कहा गया है कि परमेश्वर को श्राप न दें और न अपने लोगों के प्रधान को श्राप दें। सरल शब्दों में इसका अर्थ है कि परमेश्वर की प्रतिष्ठा के विरुद्ध कुछ भी असंयत या अपमानजनक न किया जाए, और सामुदायिक नेतृत्त्व के प्रति असम्मान से बचना चाहिए। यह निष्कपटता और सम्मान की नींव रखता है, ताकि समाज में न्याय और व्यवस्था बनी रहे।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
निर्गमन की किताब में कानून-संहिता पूरी तरह सामने आती है, जिसमें समाज के विभिन्न पथों को व्यवस्थित करने के नियम दिए गए हैं। यहाँ कहा गया है कि धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व की गरिमा के प्रति सचेत रहना आवश्यक है, क्योंकि नेता परमेश्वर की प्रतिनिधि-हस्त होते हैं। इस नियम से यह भी संकेत मिलता है कि किसी भी प्रकार के अभद्रता या असम्मान से सामाजिक अनुशासन और सौहार्द खतरे में पड़ सकता है।
व्याख्यात्मक अवलोकन
- परमेश्वर की महिमा से किसी भी तरह का नुकसान या अपमान, चाहे वह व्यक्तिगत हो या सामुदायिक स्तर पर हो, सीधे धार्मिक और नैतिक नीति के विरुद्ध है।
- नेताओं के प्रति आदर, परामर्श और न्यायपूर्ण व्यवहार बनाए रखना आवश्यक है, ताकि उनके द्वारा कुशलता से शासन संभव हो और लोग सही मार्ग पर चलें।
- यह नियम समाज में सम्मान, अनुशासन और स्थिरता के मूल्य को पुष्ट करता है, ताकि अत्याचार या अविश्वास के अवसर कम हों।
संरचना के अनुसार 2-3 प्रमुख बिंदु
क्रॉस-रेफरेंसेस और उनका संक्षिप्त स्पष्टीकरण
1) प्रस्थान 22:17-21 — सामाजिक और धार्मिक कानूनों के उल्लंघन से जुड़े निषेध स्पष्ट करते हैं कि कमजोरों के अधिकारों का सम्मान कैसे किया जाए।
2) व्यवस्थाविवर 27:18 — नीतियों और नेताओं के प्रति सहीिहन सम्मान की आवश्यकता को और स्पष्ट करता है कि नेतृत्व के बिना नियंत्रण कठिन हो सकता है।
3) अभिलिखित 1 पतरस 2:17 — प्रत्येक के साथ सम्मान, प्रेम, और मर्यादा से व्यवहार करने का सामान्य सिद्धांत जो पुराने नियमों के अनुरूप है।
व्यावहारिक निष्कर्ष
हमारे दिन-प्रतिदिन के रिश्तों में भी इस शिक्षण का अर्थ है: गुरु, शिक्षक, अधिकारी, या समुदाय के नेता के प्रति सम्मान बनाए रखना; आलोचना करें तो रचनात्मक तरीके से करें; और परमेश्वर की महिमा के साथ निज-स्वार्थ से ऊपर उठकर व्यवहार करें।