Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
निर्गमन 1 निर्गमन 2 निर्गमन 3 निर्गमन 4 निर्गमन 5 निर्गमन 6 निर्गमन 7 निर्गमन 8 निर्गमन 9 निर्गमन 10 निर्गमन 11 निर्गमन 12 निर्गमन 13 निर्गमन 14 निर्गमन 15 निर्गमन 16 निर्गमन 17 निर्गमन 18 निर्गमन 19 निर्गमन 20 निर्गमन 21 निर्गमन 22 निर्गमन 23 निर्गमन 24 निर्गमन 25 निर्गमन 26 निर्गमन 27 निर्गमन 28 निर्गमन 29 निर्गमन 30 निर्गमन 31 निर्गमन 32 निर्गमन 33 निर्गमन 34 निर्गमन 35 निर्गमन 36 निर्गमन 37 निर्गमन 38 निर्गमन 39 निर्गमन 40Verse
निर्गमन 23:1 निर्गमन 23:2 निर्गमन 23:3 निर्गमन 23:4 निर्गमन 23:5 निर्गमन 23:6 निर्गमन 23:7 निर्गमन 23:8 निर्गमन 23:9 निर्गमन 23:10 निर्गमन 23:11 निर्गमन 23:12 निर्गमन 23:13 निर्गमन 23:14 निर्गमन 23:15 निर्गमन 23:16 निर्गमन 23:17 निर्गमन 23:18 निर्गमन 23:19 निर्गमन 23:20 निर्गमन 23:21 निर्गमन 23:22 निर्गमन 23:23 निर्गमन 23:24 निर्गमन 23:25 निर्गमन 23:26 निर्गमन 23:27 निर्गमन 23:28 निर्गमन 23:29 निर्गमन 23:30 निर्गमन 23:31 निर्गमन 23:32 निर्गमन 23:33



क्यों यह वाक्य महत्त्वपूर्ण है
निर्गमन 23:21 में यीशु-यात्रा और जंगल-यात्रा के कठिन दौर में परमेश्वर के भेजे गए अग्रदूत के अनुयायियों के लिए चेतावनी और मार्गदर्शन स्पष्ट किया गया है। वाक्य कहता है कि विरोध न करना, उसकी मानना और सावधान रहना—यह तीनों अवश्यकताएँ परमेश्वर के नाम और उसकी उपस्थिति के प्रति हमारी बोध-भावना को दर्शाती हैं। यह न केवल तत्काल इस्राएलियों के लिए था, बल्कि हर दासता-पूर्व और नवजीवन में आए विश्वासियों के लिए भी है; क्योंकि परमेश्वर के नाम का स्थायित्व और उसकी आत्मा की निवास-स्थिति हमारे जीवन के प्रत्येक कदम पर निर्णय-संवेग बनाती है।
原-संदर्भ और मुख्य संदेश
पढ़ते समय ध्यान देने योग्य है कि यह अध्याय परमेश्वर के साथ निर्भरता और लोक-नियमों के पालन पर केंद्रित है। इस पंक्ति में कहा गया है कि परमेश्वर के दर्शन में सावधान रहना और उसकी मानना आवश्यक है; क्योंकि उसका नाम हमारे साथ रहता है। यह बताते हैं कि परिपूर्णता केवल बाहरी कर्म नहीं है, बल्कि परमेश्वर की उपस्थिति के साथ जीवनयापन करना है। यदि हम उसका विरोध करते हैं, तो हमारे अपराध क्षमा न होने की स्थिति आ सकती है, क्योंकि परमेश्वर की पवित्रता के सामने परमेश्वर-नाम की महिमा सत्य है।
मुख्य विषय-वाक्यों के पीछे विचार
पवित्र शास्त्र से संबद्ध बातें
इस वाक्य के अर्थ को गहराई से समझने के लिए नीचे तीन सम्बन्धित विचार दिए जाते हैं:
अनुकूल Cross-References (संक्षेप में)
यही संदेश कुछ अन्य आयतों में भी उभरता है:
नोट: उपरोक्त cross-references का उद्देश्य पाठ के पाठक को संकल्पित पथ दिखाना है; कृपया वास्तविक पदों के शब्दों से भिन्न संक्षिप्त विचार देखें।
छोटा-सा devotional विचार
जीवन के हर घड़ी में परमेश्वर का नाम हमारे साथ है—यही कारण है कि ज्ञान के साथ वफादारी भी चाहिए। जब भी आप किसी निर्णय के सामने हों, शांतिपूर्वक यह स्मरण करें कि वह आपके मार्गदर्शक हैं। सत्य में चलना ही सुरक्षा है और सुरक्षित मार्ग पर अंततः शांति मिलती है।
छोटे लेखन-वाक्य (Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke) से प्रेरणा
यह भाग मौलिक विचारों को एक सुगठित रूप में समाहित करता है: परमेश्वर की उपस्थिति में चलना, उसके नाम की पवित्रता के प्रति ईमानदारी, और हृदय-ढाँचों के अनुरूप जीवन।
सम्बन्धित उद्धरण यदि उपलब्ध हों, तो वे संक्षेप में प्रविष्ट हैं; पूर्ण पाठ उद्धृत नहीं किया गया है ताकि पाठक के लिए नया अन्वेषण बना रहे:
Matthew Henry के स्वर से: “जहाँ परमेश्वर का नाम रहता है, वहाँ उसकी निष्ठा और protective शक्ति भी बनी रहती है।”
Albert Barnes के अनुसार: “निर्देश-प्राप्ति के लिए प्रार्थना और समर्पण एक साथ चलते हैं, ताकि विरुद्ध राहों में भी तुम्हारा आचरण पवित्र रहे।”
Adam Clarke के अनुसार: “परमेश्वर के नाम का स्थान अप्रतिबंधित नहीं, बल्कि साहचर्य और निर्देश का स्रोत है, जिससे अपराध क्षमा-योग्य हो सकता है यदि दिल परिवर्तन हो।”