Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
निर्गमन 1 निर्गमन 2 निर्गमन 3 निर्गमन 4 निर्गमन 5 निर्गमन 6 निर्गमन 7 निर्गमन 8 निर्गमन 9 निर्गमन 10 निर्गमन 11 निर्गमन 12 निर्गमन 13 निर्गमन 14 निर्गमन 15 निर्गमन 16 निर्गमन 17 निर्गमन 18 निर्गमन 19 निर्गमन 20 निर्गमन 21 निर्गमन 22 निर्गमन 23 निर्गमन 24 निर्गमन 25 निर्गमन 26 निर्गमन 27 निर्गमन 28 निर्गमन 29 निर्गमन 30 निर्गमन 31 निर्गमन 32 निर्गमन 33 निर्गमन 34 निर्गमन 35 निर्गमन 36 निर्गमन 37 निर्गमन 38 निर्गमन 39 निर्गमन 40Verse
निर्गमन 7:1 निर्गमन 7:2 निर्गमन 7:3 निर्गमन 7:4 निर्गमन 7:5 निर्गमन 7:6 निर्गमन 7:7 निर्गमन 7:8 निर्गमन 7:9 निर्गमन 7:10 निर्गमन 7:11 निर्गमन 7:12 निर्गमन 7:13 निर्गमन 7:14 निर्गमन 7:15 निर्गमन 7:16 निर्गमन 7:17 निर्गमन 7:18 निर्गमन 7:19 निर्गमन 7:20 निर्गमन 7:21 निर्गमन 7:22 निर्गमन 7:23 निर्गमन 7:24 निर्गमन 7:25



सीधे अर्थ का सार
निर्गमन 7:14 में कहा गया है कि परमेश्वर ने मूसा से कहा कि फ़िरौन का मन कठोर हो गया है और वह इस पूरी प्रजा को जाने नहीं देता। इस एक वाक्य में दो बातें स्पष्ट होती हैं: (1) परमेश्वर की अनुमति से मोड़ आया है कि फ़िरौन कठोर मन बनाए रखे, (2) इस कठोरता के कारण मिस्र की जनता को मुक्ति पाने का अवसर अवरुद्ध हो रहा है।
परिप्रेक्ष्य पृष्ठभूमि
कथन स्वर्गीय प्रशासन की पारदर्शिता दिखाता है—यही वह समय है जब परमेश्वर अपने दायित्व के अनुसार जमकर काम कर रहा है, जबकि फ़िरौन अपने प्रतिरोध में अड़ गया है। यह पाठ मोशे तथा आस्थावान समुदाय के लिए अनुभवजनित परीक्षा का हिस्सा है: दया और न्याय के बीच की रेखा स्पष्ट होती है, जहाँ परमेश्वर की योजना के अनुसार मुक्ति के संकेत बार-बार सामने आते हैं लेकिन मानवीय स्वार्थ उसे रोकते हैं।
interpretive observations (व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ)
थीमेटिक सूची
संदर्भित सम्बन्धी पद/व्याख्या (Cross-references)
नीचे क्रमशः तीन संबंधित आयतों को संक्षेप में जोड़ा गया है ताकि पाठ की व्यापक परिप्रेक्ष्य समझ बने:
प्रत्येक संदर्भ दर्शाता है कि ईश्वर की योजना में मानव चयन और उसकी प्रतिक्रिया दोनों की भूमिका है, और इनमें से हर चयन के पास प्रभु की योजना के अनुसार परिणाम होते हैं।
व्यावहारिक निष्कर्ष
इस वचन से प्रेरणा मिलती है कि निजी कठिनाई के दौरान भी हम सद्गुण बनाए रखें, और परमेश्वर की योजना पर भरोसा रखें। परिवर्तन क्या है, यह समय बताएगा; पर हमारी दुआ, अटूट विश्वास और नैतिक निष्ठा वही स्थिर रहेगी जो हमें निरन्तर आगे बढ़ाती है।
सूक्ष्म मौलिक उद्धरण (ध्यान दें)
यहाँ Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke से सीधे उद्धरण आवश्यक होने पर जो जोड़ा गया है, वे निम्न प्रकार के हैं: “फिरौन का मन कठोर हो गया है”—यह उनकी विश्लेषणात्मक व्याख्या में बार-बार उद्धृत विचार है।