Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
निर्गमन 1 निर्गमन 2 निर्गमन 3 निर्गमन 4 निर्गमन 5 निर्गमन 6 निर्गमन 7 निर्गमन 8 निर्गमन 9 निर्गमन 10 निर्गमन 11 निर्गमन 12 निर्गमन 13 निर्गमन 14 निर्गमन 15 निर्गमन 16 निर्गमन 17 निर्गमन 18 निर्गमन 19 निर्गमन 20 निर्गमन 21 निर्गमन 22 निर्गमन 23 निर्गमन 24 निर्गमन 25 निर्गमन 26 निर्गमन 27 निर्गमन 28 निर्गमन 29 निर्गमन 30 निर्गमन 31 निर्गमन 32 निर्गमन 33 निर्गमन 34 निर्गमन 35 निर्गमन 36 निर्गमन 37 निर्गमन 38 निर्गमन 39 निर्गमन 40Verse
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निर्गमन 9:14 — जीवन में दृढ़तापूर्वक परमेश्वर की ताकत के संकेत
पवित्र लेखन से मानवीय अनुभव पर प्रतिबिंब
यह वचन दिखाता है कि परमेश्वर अपनी स्वेच्छा से अपने लोगों की रक्षा और उसकी महिमा के लिए शक्तिशाली चेतावनी भेजता है, चाहे वह समय-समय पर कष्टदायक क्यों न हो। लेखक के रूप में Moses के माध्यम से, भगवान यह स्पष्ट करते हैं कि सत्य-आधार पर पुनः-नियत और नीति उनके हाथ में है; उनका उद्देश्य केवल दंड नहीं, बल्कि अपराधियों को सच्चाई की ओर झुकना है ताकि वे ईश्वर के वास्तविक अधिकार को मानें।
पवित्रता के शब्द और ध्वनि-चित्र
“और तेरे कर्मचारियों और तेरी प्रजा पर सब प्रकार की विपत्तियाँ डालूँगा” – यहाँ विपत्ति एक नैतिक उपकरण के रूप में प्रस्तुत है, जो मिस्र के शासक के प्रति बेजोड़ दया और न्याय का एक संयुक्त संकेत है: परमेश्वर अपनी महिमा को दिखाते हैं और साथ ही लोगों को उनकी दया, पराक्रम और पवित्रता की आवश्यकता का संयम देते हैं।
महत्वपूर्ण शब्दों के विश्लेषण
अनुसरणीय पदों से संबंध
- हीब्रू—इशारों के साथ, 9 के अध्याय में अन्य विपत्तियाँ और चमत्कार दिखाते हैं कि परमेश्वर की महिमा मिस्र के देवताओं के संकेतों को भी दबा देती है; यह एक सार्वभौमिक सत्य है कि परमेश्वर की श्रेष्ठ सत्ता सब जगह काल के पार है।
- निर्गमन 7–12 के चक्र में, पाप के परिणामस्वरूप प्रकृतिक विपत्तियाँ आती हैं जो मिस्र के विश्वासघात और असत्य के विरुद्ध एक चेतावनी के रूप में काम करती हैं।
- यशायाह 45:22–23 में, एक समान विचार मिलता है कि पृथ्वी के हर राज्य, हर कुल, हर व्यक्ति को उसकी उपस्थिति स्वीकार करनी चाहिए—“सिर्फ मुझ में विश्वास करो” की आह्वान।
आज के संदर्भ में व्यवहारिक अनुप्रयोग
- कठिन समय में भी परमेश्वर की sovereignty पर अडिग रहें: विपत्तियाँ कभी-कभी मनुष्यों को सच बताने के लिए आती हैं—परन्तु उनका लक्ष्य न केवल दंड देना बल्कि दिलों को पूर्व-निर्धारित पथ पर लौटना है।
- परमेश्वर के वरदान और अधिकार को पहचानना: जीवन की हर परिस्थिति में यह याद रखें कि परमेश्वर ही सर्वशक्तिमान है और वही नीति-निर्णय का आधार है।
क्लासिक टिप्पणीकारों के संक्षिप्त संकेत
-Matthew Henry ने कहा कि परमेश्वर की योजनाओं में दंड और दया दोनों समाहित रहते हैं ताकि लोग सचेत हों और उसकी महिमा को जानें।
-Albert Barnes ने समझाया कि विपत्तियाँ निष्कर्ष-परक नहीं, बल्कि चमत्कारिक चेतावनी के रूप में आती हैं ताकि लोगों में विवेक जगे।
-Adam Clarke ने स्पष्ट किया कि यहाँ शब्द “तुझ पर” दर्शाता है कि राजा के प्रत्येक कदम परमेश्वर के आदेशों के अनुसार नियंत्रित होते हैं, और उसका प्रभाव व्यापक होता है।
नोट: इन टिप्पणीकारों के बीच संक्षिप्त उद्धरण उपस्थित हैं ताकि पाठ का गहरा सार उभर कर आए।
संक्षेप
इस वचन के माध्यम से दिखता है कि संपूर्ण सृष्टि में परमेश्वर की सत्ता एक अनिवार्य सत्य है, और मानव इतिहास में उसकी महिमा दिखाने हेतु विपत्तियाँ भी एक उद्देश्य को संवारती हैं—ताकि हर प्राणी जान ले कि पृथ्वी पर उसका ही सर्वोच्च अधिकार है।