Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 15:6 पर टिप्पणी
परिचय: यिर्मयाह की पुस्तक में ईश्वर के शब्द अत्यंत कठोर और करुणा-युक्त दोनों रूप धारण करते हैं। यहाँ वह अपने चुने हुए लोगों के प्रति गहरी असंतुष्टि और वैमनस्य व्यक्त करते हैं, जबकि साथ ही पथभ्रष्ट राष्ट्र के लिए न्याय की ज़रूरत भी रेखांकित करते हैं। इस पाठ में Yahweh कहते हैं कि उन्होंने लोगों की चेतावनियों पर भी थककर अंततः व्यवस्थित प्रतिक्रिया तय कर ली है।
पद का पाठ: यिर्मयाह 15:6
यहोवा की यह वाणी है कि तू मुझको त्याग कर पीछे हट गई है, इसलिए मैं तुझ पर हाथ बढ़ाकर तेरा नाश करूँगा; क्योंकि, मैं तरस खाते-खाते थक गया हूँ।
पाठ का सार व अध्याय के भीतर इसका स्थान
उच्चारण स्पष्ट है: लोगों ने परमेश्वर के प्रति प्रत्यक्ष अवज्ञा और विश्वासघात किया है। यिर्मयाह की घोषणा वह धार्मिक-राजनैतिक भ्रष्टाचार है जो प्रजा-राजा दोनों को प्रभावित करता है। यीशु के समय से पहले की निराशा की यह भाषा दर्शाती है कि ईश्वर समय-समय पर चेतावनियाँ देता है, परंतु जब हृदय परिवर्तन नहीं होता, तब दंड और शासन की सबसे कड़क μορी अपनाई जा सकती है। यह वाक्य यह भी संकेत देता है कि परमेश्वर की दया में सीमा भी होती है, और पाश्चात्य नहीं, बल्कि नैतिक निर्भरता के भीतर न्याय भी पूरा होता है।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
अनुरूप संदर्भ और आत्मिक पाठ
— ईश्वरीय चेतावनी के साथ करुणा की परिपाटी: यह संदेश दयालुता और न्याय के संतुलन को दिखाता है।
— अन्य जगहों पर पाप के परिणाम: परमेश्वर कई बार पाप की अवहेलना पर कटुता दिखाते हैं, परन्तु पश्चात भी intercession और परिवर्तन की संभावना खुली रहती है।
अनुप्रयोग
1) अपने जीवन में यह देखें कि क्या हम परमेश्वर की आवाज़ को पीछे कर रहे हैं, या उसकी मार्गदर्शक दिशा में चल रहे हैं।
2) यदि हम गलत मार्ग पर हैं, तो आत्म-परिवर्तन और दुर्व्यसन से मुक्ति के लिए ईश्वर के साथ शुद्ध संकल्प लें।
3) समुदाय में दृढ़ता से सत्यनिष्ठा बनाए रखें ताकि न्याय और दया दोनों का संतुलन बना रहे।
क्रॉस-रेफरेंस और उनके संक्षिप्त संयोजन
— लूत के निर्णयों के संदर्भ में समान ध्वनि: चेतावनी के बाद भी दया की राह खुली रहती है।
— रेचेल के उद्धार के पाठ्यों में भी विश्वासघात से बचने की सीख मिलती है कि सीधे विश्वास में रहकर परमेश्वर की मांगों का पालन करें।
— मत्ती 23:37 जैसे उद्धरण—यहोवा के घर की करुणा बनाम दंड की आवश्यकता का संतुलन समझना आवश्यक है।
एक समापन सार
यिर्मयाह 15:6 हमें एक ठोस प्रवचन देता है: परमेश्वर के विरुद्ध बार-बार उकसाने से शास्त्रीय न्याय के अनुसार परिणाम सामने आते हैं, परंतु चेतावनी और अवसर—ये दोनों मिलकर पथ पर लौटने के लिए प्रेरित करते हैं। हमारी सुरक्षा यही है कि हम ईश्वर के प्रति निष्ठिर रहें और उसकी दया के मार्ग में बने रहें।
मार्गदर्शक उद्धरण (सहायक टिप्पणियाँ से)
यदि उन वक्तव्यों में से कुछ शब्द पढ़े जाएँ, तो नीचे दिए गए स्पष्ट पाठ उद्धरण केवल तभी मान्य होंगे जब वे पूर्ण पाठ से उद्धृत हों।
महत्वपूर्ण उद्धरण: “तू मुझको त्याग कर पीछे हट गई है”—यहाँ लेखक का स्वर निर्णायक है, जो तीखेपन के साथ चेतावनी देता है।