Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52



यिर्मयाह 20:13 का महत्व और संदर्भ
यह पद यिर्मयाह की पुस्तिका में उन कठिन दशाओं के बीच खुशी और आशीष के क्षणों को दर्शाता है जब नबी खुद संकट से गुजर रहा था। प्रचलित हताशा और विरोध के बावजूद यह वाक्य यह बताता है कि परमेश्वर के साथ गान करने और उसकी स्तुति करने से दुष्टों के उत्पीड़न के बीच भी आशीर्वाद और राहत मिलती है। यह संदेश खासकर तब प्रभावी है जब मानवीय दृश्य अत्यधिक कष्टकारी हों—घोर दबाव के समय भी ईश्वर की प्रगट कृपा का स्मरण रहना चाहिए।
प्रत्यय (Original Context) और संदेश
यिर्मयाह ने नीति-निर्देश और tobic दृष्टि के बीच एक कठोर काल में यह गीत प्रस्तुत किया है। उनकी समस्या बाह्य विरोध, राज्य के विघटन और आंतरिक असमंजस से उपजी थी; किन्तु वह जानता है कि प्रभु का उद्धार दयालु है। इस पद में वह सीधे परमेश्वर को बुलाकर उसकी स्तुति करता है और धर्म के कारण बनने वाले संकट से सुरक्षा की despejo माँगता है। यह एक प्रेरणादायक paradox है: गाने के कारण संकट कम नहीं होते, परन्तु विश्वास में स्थिरता मिलती है।
मुख्य संदेश
विवेचना और उपयुक्त उद्धरण
यह कविताात्मक अभिव्यक्ति यह दिखाती है कि दुष्टों के योजनाबद्ध दबाव के बीच भी ईश्वर के प्रति आस्था और गर्व-रहित स्वागत एक सुरक्षित refuge बन जाता है। कुछ पार्श्व विचार: - प्रार्थना और स्तुति एक साथ: संकट के समय भी प्रार्थना और स्तुति, दोनो एक साथ चलते हैं ताकि विश्वास पक्के रहें। - दायित्व-समर्थन: कमज़ोर समुदाय की रक्षा ईश्वर की नीतियों का केंद्र है, और वे उसे भरोसे के साथ अनुभव करते हैं।
क्रॉस-रेफरेंस (Cross-references) और संक्षिप्त व्याख्या
1) भजन 34:4-7 — प्रभु के लिए गान की प्रतिक्रिया: भय के समय इमानदारी से पुकारना और उद्धार पाना।
2) यशायाह 25:9 — यह दर्शाता है कि उस दिन लोग कहते हैं, प्रभु यीशु के साथ शान्ति और सुरक्षा के क्षण होंगे; यह श्रद्धा के दायरे को उजागर करता है कि प्रभु किस प्रकार संकट के बीच उद्धार देता है।
3) मत्ती 5:44-45 — प्रेम और आशीर्वाद के रास्ते: परमेश्वर दया के मार्ग पर चलता है और सच्चे धर्म का परिचय देता है, चाहे आलोचना हो या विरोध।
अनुवादक उद्धरण (Historical commentators)
महत्वपूर्ण स्पष्टता के लिए:
Matthew Henry से मिलती-जुलती टिप्पणियाँ (संक्षेप): “प्रभु के सामने गान करना कठिन समय में भी विश्वास को बनाये रखता है; His praise remains a shield against despair.”
Albert Barnes से संक्षेप: “स्तुति, विपत्ति के बीच आश्वासन का स्रोत है; यह प्रार्थना की पुष्टि और दृढ़ विश्वास देता है।”
Adam Clarke से संक्षेप: “यहोवा की स्तुति का अभ्यास, निर्भरता और सुरक्षा की याद दिलाता है; दासत्व के समय भी ईश्वर की कृपा स्पष्ट होती है।”
देवotional विचार
जब दिल भारी हो और रास्ते धुंधले लगें, तब यह पद एक सरल मार्गदर्शक बन सकता है: पहले परमेश्वर की महिमा के लिए गाओ, फिर विश्वास में आराम पाओ। दुष्टों के दबाव के बावजूद, प्रभु के संरक्षण की स्मृति मन को स्थिर करती है और नये साहस से आगे बढ़ाती है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 20:13 यह शांति देता है कि भले ही परिस्थितियाँ कठिन हों, परमेश्वर के प्रति विश्वास और उसकी स्तुति किसे-भी हालत मेंमानव आस्था को मजबूत कर सकते हैं। यह उद्धारकारी संदेश उस समय भी सत्य है जब हम दरिद्र जन के प्राण की सुरक्षा के लिए पुकारते हैं।