Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52



यिर्मयाह 20:4—सूचित भय और उद्धार की आशा
यह वचन यिर्मयाह की किताब में प्रसंगगत संघर्ष के बीच आता है, जहाँ परमेश्वर अपने भविष्य की कठोर असंयमता के बावजूद प्रेमपूर्ण मत्प्रेषक बनकर उद्धार की राह बनाते हैं। बंधन और भय का असहज संयोजन यहाँ दिखता है: तेरे और तेरे मित्रों के लिये भय का ठहरना, शत्रुओं की तलवार, और बाबेल की वहशत। परन्तु इसके पीछे परमेश्वर की पूर्ण सत्ता और दयामय उद्देश्य छिपा है।
पद का पाठ और उसका संदर्भ
यिर्मयाह 20:4 में कहा गया है कि यहोवा कहता है: “मैं तुझे तेरे लिये और तेरे सब मित्रों के लिये भी भय का कारण ठहराऊँगा...” यह भविष्यवाणी यहूदियों के दुष्ट आधिपत्य, युद्ध-नाश और बंधन की प्रतिष्ठित स्थिति को दर्शाती है। साथ ही, यह कहता है कि बाबेल के राजा के हाथों में वे होंगे और तलवार से मारे जाएंगे। यह सब परमेश्वर के न्याय और दिव्य योजना के अंतर्गत है—जब उसका peuple अविश्वास और विद्रोह में डूबा हो।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
अन्य बाइबल अंशों से सम्बंध
इस संदर्भ में विश्वासयोग्य पाठ के कुछ समान संकेत अन्यत्र मिलते हैं:
इन क्रॉस-रेफरेंसेज़ से स्पष्ट होता है कि कठिन प्रसंगों में भी परमेश्वर अपने विश्वासपात्रों के लिये सुरक्षा और दिशा प्रदान करते हैं, भले ही परिस्थितियाँ विपरीत प्रतीत हों।
व्यावहारिक पालन और क्रमबद्ध समझ
1) कठिन समय में भी परमेश्वर की योजना पर भरोसा रखें; भय आपको प्रेरित बतौर परीक्षण कर सकता है, पर यह नष्ट नहीं करता।
2) समुदाय के प्रति उत्तरदायित्व: “तेरे लिये और तेरे मित्रों के लिये भी भय” से यह स्पष्ट होता है कि बुरे दिनों में आपका सहयोगी और स्तम्भ कैसे बन सकता है—सहानुभूति और समर्थन से।
3) आत्म-नियंत्रण और विश्वास-वाद: शत्रु के दबाव में भी पवित्रता बनाए रखें; ईश्वर का वचन मार्गदर्शक बनता है।
पूर्ण-पाठ के अनुसार संक्षेप
यिर्मयाह 20:4 एक कठोर परन्तु आवश्यक चेतावनी है—परन्तु यह भी आश्वस्त करता है कि परमेश्वर अपने लोगों को भय से मुक्त करने का नियत रखते हैं, भले ही वह समय वे युद्ध, बंधन, या समाजिक भ्रष्टाचार के रूप में आए। यह वचन एक संत-जीवन की गहरी सीख देता है: विश्वास के साथ आस्था और निष्ठा बनाए रखें, क्योंकि परमेश्वर का उद्देश्य अंततः उद्धार और पुनर्स्थापन है।
कठिन समय में भी प्रभु के अपने लोगों के लिए आशा का संदेश यह है कि उनका जीवन परमेश्वर की योजना से जुड़ा है; भय के क्षणों में भी वह हाथ नहीं छोड़ते, और अंततः वेbrengen उद्धार का मार्ग दिखाते हैं।
प्रेरक उदाहरण: मीनिंगफुल उद्धार के लिए Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक-डायमंड टिप्पणीकारियों की वेदना-कथाएँ संकेत देती हैं—पर मुख्य संदेश यही रहता है कि परमेश्वर न्याय भी करता है और विश्वासियों की रक्षा भी करता है।