Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 23:26 पर एकीकृत टिप्पणी
मूल विचार: भविष्यद्वक्ताओं को देखकर जो झूठ बोलते हैं, वे अपने मन की कल्पना को ही भविष्यवाणी बनाते हैं—कर्ता-ध्यान में बंधे यह धोखा परमेश्वर के वचनों से भिन्न है। इस वाक्य के द्वारा ईश्वर अपने संदेश की सत्यता और मानव स्वार्थ की छलकपट के बीच स्पष्ट विभाजन बताते हैं।
पाठ-संदर्भ और साहित्यिक संदर्भ
यह वाक्य यिर्मयाह के संकट-संदेश के दौरान आता है, जब निराशा के समय में कुछ मसीह-पूर्वदर्शक शोर मचाते हैं और सत्ता-उद्धार की धारणा बुनते हैं। भगवान कहते हैं, लोग जो अपने मन से प्रेरित होकर भविष्यवाणी करते हैं, वे वास्तविक प्रेरणा नहीं, बल्कि अपने ही स्वार्थ, भ्रम और कल्पना से बोलते हैं। यह पहचान लेखक-नाटक के भीतर एक सतर्क बोध बनाती है: समारोहों या प्रचारों के पीछे संकेत के बजाय प्रेरणा है या नहीं?
तीसरे पक्ष के उद्धरण उपलब्धता के बारे में
इस उद्धरण के लिए मैथ्यू हेन्री, अलेक्जेंडर बार्न्स और अAdam Clarke जैसे सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणीकारों के संकलनों से विशिष्ट अनुरोध किया गया है। नीचे उनके शब्दों के छोटे अंश के रूप में सीधे उद्धरण नहीं दिए जा रहे हैं—परितय स्रोतों से संदर्भ के तरीक़े में वे जो सामान्य विवेचनाएँ देते हैं, उसका समेकित सार यहाँ प्रस्तुत है:
साहित्यिक और théological महत्त्व
यह वाकya न सिर्फ भविष्यवाणी के सत्यापन की बात करता है, बल्कि अस्थिर, सूचित नहीं भीड़-भाड़ के समय में नैतिक विवेक दिखाने की मांग करता है। भविष्यवक्ता कौन हैं, यह पहचानना परमेश्वर के संदेश को बचाने की पहली शर्त है। झूठी भविष्यवाणी से समाज में भय, भ्रम और भ्रष्टाचार बढ़ सकता है।
पवित्र शास्त्र से CROSS-REFERENCES और संक्षिप्त स्पष्टीकरण
इन संदर्भों में भाग-तत्व यह है कि शब्द-प्रेरणा ईश्वर से आनी चाहिए; नहीं तो वह मानव-मन के छल को उजागर कर देती है।
आत्म-चिंतन के लिए प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 23:26 में दर्शाया गया यह सच दो मुख्य धारणाओं को समेटे है: सत्य के संकेतों को पहचानना और झूठी भविष्यवाणी से सचेत रहना। प्रेरणा का स्रोत यदि मानव-मन हो, तो उसका परिणाम भ्रम और असंतोष होगा; पर यदि प्रेरणा परमेश्वर से हो, तो वह जीवन-निर्देश बनकर समाज को बुलंद दिशा देता है। सतर्क रहें और परमेश्वर के सत्य-प्रकाश में ही मार्ग ढूंढ़ें।