यिर्मयाह 44:3 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

क्योंकि उनके निवासियों ने वह बुराई की जिससे उन्होंने मुझे रिस दिलाई थी वे जाकर दूसरे देवताओं के लिये धूप जलाते थे और उनकी उपासना करते थे, जिन्हें न तो तुम और न तुम्हारे पुरखा जानते थे।

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यिर्मयाह 44:3 पद-दर-पद बाइबल टीका

यिर्मयाह 44:3 — मुख्य निष्कर्ष

यिर्मयाह की भविष्यवाणी में इस वचन के पीछे जलती हुई चेतावनी है: जब लोग अपने देश के भीतर अस्थिर आशाओं और अज्ञात देवताओं की उपासना में डूब जाते हैं, तो वे अपने ही पितरों द्वारा स्थापित विश्वास से दूर हो जाते हैं और सामाजिक विचलन से परिणाम भुगतते हैं। भली-भांति समझना यह है कि यह संदेश केवल पूर्वकाल की कहानी नहीं, बल्कि परमेश्वर के साथ एक बार फिर से अपने जीवन के केंद्र में लौटने का आग्रह है, ताकि वह बुराइयों से बच निकले और उसके निर्देशों के अनुसार चलें।

साहित्यिक संदर्भ (literal और विषयगत प्रवाह)

यह पद यिर्मयाह के समय के उन लोगों के बारे में है जिन्होंने मिस्र-भरोसे के बीच अपने देव-निष्ठा को दोहराने की ठानी। उद्धृत पंक्तियाँ वे हैं जो बताते हैं कि वे उन देवताओं की पूजा करते थे जिन्हें “तुम और तुम्हारे पुरखों ने कभी जाना नहीं” था—अर्थात वे अज्ञात देवताओं के पंखों पर आश्रय लेते हैं, जिससे परमेश्वर के अनुग्रह और व्यवस्था से दूरी बढ़ती है। यह पाठ धार्मिक जड़ता और आत्म-स्वार्थ के परिणामस्वरूप उनके देश के विरुद्ध अन्याय और विधर्मी कर्मों की प्रवृत्ति को उजागर करता है।

थियोलॉजिकSignificance (धार्मिक महत्व)

यह वचन दो प्रमुख चेतावनियाँ देता है: पहली, आत्म-निर्भरता या सामाजिक दबाव के कारण परमेश्वर के अलावा अन्य देवताओं की दिशा में पलायन; दूसरी, यह कि उपासना में हेरफेर से राष्ट्र के संस्कार और नैतिकता क्षीण होती है। ईश्वर के प्रति अविश्वास और नई-पुरानी देवताओं के संयुक्त प्रभाव से सामाजिक-आत्मिक भ्रष्टाचार बढ़ता है। रामना के साथ जुड़ी निष्ठा का टूटना, न्याय के रास्ते से दूर होना, और अंततः दयालु उत्तरदायित्व से विमुख होना—ये सब चरित्रगत गिरावट के लक्षण हैं।

Cross-References (संकिरण संदर्भ) और उनके संक्षिप्त अर्थ

  • यिर्मयाह 10:15 — मूर्तिपूजा की अस्थिरता को कपटपूर्ण कहा गया है; अविश्वासी पूजा भी पथभ्रष्ट करती है।
  • यिर्मयाह 17:5 — मनुष्य की निर्भरता को परमेश्वर से हटकर अन्यत्र रखने की चेतावनी; आत्म-निर्भरता के जोखिम सामने आते हैं।
  • यशाय 44:9-20 — मूर्तियों के निर्माण और उनके पीछे मानवीय मूर्ति-निर्माण की विवशता; सच उद्धारकर्ता के अभाव में अध्यात्मिक ठहराव।

संयोगपूर्वक, ये संदर्भ दिखाते हैं कि बुराई के कारण पूजा के स्थान और मार्ग बदलना मनुष्यों के आंतरिक विश्वास से जुड़ा रहा है, और इसका प्रभाव समाज पर पड़ता है।

Reflection Questions ( réflexion/विचार के प्रश्न)

  1. क्या मैं किसी स्थिति में परमेश्वर के स्थान पर अन्य व्यक्तियों, परिस्थितियों या विचारधाराओं को प्राथमिक दे रहा/रही हूँ?
  2. मेरे जीवन के कौन से क्षेत्र या आदतें मुझे परमेश्वर की आज्ञाओं से दूर ले जा रही हैं?
  3. पिछले समय में मैंने किस प्रकार प्रभु‑निष्ठा की दिशा में फिर से लौटने के लिए ठोस कदम उठाए हैं?

उपसंहार (Concluding Note)

यह पद यह स्मरण कराता है कि परमेश्वर के साथ निष्ठा ही राष्ट्र के जीवन की सुरक्षा है। उनके निवासियों ने अज्ञात देवताओं की पूजा शुरू कर दी, जिससे परमेश्वर के साथ उनका रिश्ता और नैतिकता क्षीण हुई। यदि हम अपना हृदय ईमानदारी से परमेश्वर के समक्ष खोलें और उसकी इच्छा के अनुसार जीवन बिताने का संकल्प लें, तो हम अस्थिरताओं के बीच भी स्थिरता पा सकते हैं।

उद्धरण-नोट: इस टिप्पणी में Matthew Henry, Albert Barnes, और Adam Clarke के वे विशिष्ट उद्धरण जो सीधे लक्षित पाठ से संबद्ध हैं, आवश्यक होने पर ही उल्लेखित हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यिर्मयाह 44:3 समानांतर पद और संबंधित वचन

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“यदि तेरा सगा भाई, या बेटा, या बेटी, या तेरी अर्द्धांगिनी, या प्राणप्रिय तेरा कोई मित्र निराले में तुझको यह कहकर फुसलाने लगे, 'आओ हम दूसरे देवताओं की उपासना या पूजा करें,' जिन्हें न तो तू न तेरे पुरखा जानते थे, (व्य. 17:2, उत्प. 16:5)

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और पराए देवताओं की उपासना की है जिन्हें वे पहले नहीं जानते थे, और यहोवा ने उनको नहीं दिया था;

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उन्होंने पिशाचों के लिये जो परमेश्‍वर न थे बलि चढ़ाए, और उनके लिये वे अनजाने देवता थे, वे तो नये-नये देवता थे जो थोड़े ही दिन से प्रकट हुए थे, और जिनसे उनके पुरखा कभी डरे नहीं। (1 कुरि. 10:20)

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