Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 44:22 – बुरे कर्मों के कारण देश की उजड़ना
मुख्य interpretive point: यह वचन स्पष्ट रूप से बताता है कि नीचे हुई तबाही का कारण Yahweh के प्रति वापसी न करना और घृणित कर्मों को बनाए रखना है। ईश्वर ने बार-बार चेतावनियाँ दीं, परन्तु जनशक्ति और समाजिक व्यवस्था के अनुरूप उनकी योजना बनती रही; परिणामतः देश अनजाने में निर्जन हो गया और लोग इसकी निंदा कर श्राप दे रहे हैं।
साहित्यिक संदर्भ और पृष्ठभूमि
यिर्मयाह किताब के संदर्भ में यह भाग बाबुल के दोर में प्रतिपादन की कहानी को सामने रखता है। यिर्मयाह ने यह भविष्यवाणी की कि जो लोग मिस्र के साथ भागीदारी बनाते हैं, वे अंततः अपने देश में विनाश देखेंगे। यहां अभिव्यक्ति यह भी दर्शाती है कि विरोधी रीति-रिवाजों से बचना और निरंतर पाप करना किस प्रकार राज्य के सामाजिक, धार्मिक ढांचे को कमजोर कर देता है।
थियोलॉजिकल महत्त्व
1) परमेश्वर की स्मरण-शक्ति और धैर्य: यह verse स्मरण कराता है कि जनता ने ईश्वर की स्मरणशक्ति और करुणा को भूला। 2) न्याय और दया की बुनियाद: दुष्ट कर्मों पर रोक नहीं होने से दुष्कारी प्रवृत्ति बढ़ती है और समुदाय के लिए विनाश निश्चित होता है। 3) राष्ट्र-व्यवस्था बनाम आत्म-उत्कंठा: बाहरी पूजा-पद्धतियाँ ही नहीं, आंतरिक अनुपम पाप भी देश की अस्मिता पर चोट करते हैं।
पवित्र ग्रंथों में अन्य ठोस संपर्क
इन संदर्भों में एक संयुक्त संदेश है: ईश्वर के सामने निष्ठा रखने पर ही समाज सुरक्षित रहता है; अन्यथा विश्वसनीयता और आस्था समाप्त हो जाती है।
विचार-विमर्श के प्रश्न
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 44:22 यह स्मृति दिलाते हुए प्रत्यक्ष चेतावनी देता है कि पाप निरंतर बनाए रखने से समाज और राष्ट्र की स्वाभाविक संरचना ढह जाती है। ईश्वर की धैर्य भरी चेतावनियाँ अनदेखी करने से न केवल आध्यात्मिक, बल्कि सामाजिक तबाही झेलनी पड़ती है। परन्तु यदि व्यक्ति और समुदाय ईश्वर के मार्ग को फिर से अपनाएं, तो वे उद्धार और पुनःस्थापना की आशा पा सकते हैं।
पूर्व-प्रकाशित टिप्पणीकारों के उद्धरण (संक्षेपित)
यदि आंशिक उद्धरण उपलब्ध हों, तो संदर्शित के रूप में नीचे दे रहें हैं:
Matthew Henry: “...”(उद्धरण उपलब्ध होने पर ही प्रकाशित)
Albert Barnes: “...”(उद्धरण उपलब्ध होने पर ही प्रकाशित)
Adam Clarke: “...”(उद्धरण उपलब्ध होने पर ही प्रकाशित)
cross-references:
यशाय 1:4–6 – पाप की गहराई और conseqüences; भजन 94:23 – न्याय का क्रम; जोश 23:14–15 – वादा-की आज्ञाओं के साथ दृढ़ता की आवश्यकता।