Old Testament
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यिर्मयाह 44:25 का अर्थ और संदर्भ
इस वचन में यहोवा परमेश्वर यह कह रहे हैं कि इज़राइल की और तेरी-मेरी स्त्रियाँ ने निश्चय मन्नतें बनाई थीं—यह दावा करते हुए कि वे आकाश की देवी (रानी) के लिए धूप जलातीं और तपावन-देतीं, और वे इन मन्नतों को पूरा करने की कसमें देती रहीं। परन्तु उनका जीवनव्यवहार इस प्रकट सत्य से भिन्न था: वे अपनी मन्नतों के अनुसार नहीं चलते। परमेश्वर कह रहा है کہ अब उसी कसौटी पर चलकर वे अपनी मन्नतों को पूरा भी करें।
संदर्भ पृष्ठभूमि
यिर्मयाह की पुस्तक में व्यवस्थात्मिक अपवृत्ति, आराधना-भ्रष्टाचार और देश की संकट की घड़ी में आरोप-प्रत्यावर्तन स्पष्ट रूप से उभरते हैं। यहां प्रचलित आस्थागत व्यवहार यहूदी लोक-परंपरा के अनुसार था कि वे बहिर्मुखी अनुष्ठान करते, खासकर मन्नतें—जो उन्होंने देवी-देवताओं के लिए की थीं—परन्तु आंतरिक आचरण और सामाजिक नैतिकता का पालन नहीं करते। यह वचन इन्हीं दोहरावों पर चोट करता है: बाहरी धार्मिक क्रिया बनाम आंतरिक समर्पण।
व्याख्यात्मक सुझाव
- धूप-तपावन और मन्नतें प्रचलित थे, परन्तु यहोवा का निर्देश है कि मन और व्यवहार में एकरूपता होनी चाहिए।
- मन्नतों का प्रमाण-पत्र होने के बावजूद देश-व्यवहार में अविश्वास, दमन, और विधर्मिता का परिचय था; इसीलिए शास्त्रकर्ता इसे उनके आचर-व्यवहार की असंगतता के रूप में देखते हैं।
मुख्य विचार
अन्य धर्मग्रंथों से सन्निर्वाहित सम्बन्ध
यिर्मयाह 7:9-11— बाहरी आराधनाओं के साथ आंतरिक पाप का मिलना नहीं चलेगा; ईश्वर इच्छा करते हैं कि जीवन-संयम और न्याय भी साथ हों।
यिर्मयाह 6:20— ताबीज और अनुष्ठान से कुछ नहीं बदलेगा यदि आचरण पाप से भरा है; परमेश्वर सत्य-सक्का चाहता है।
यशायह 1:11-17— केवल धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और उद्धार के कार्य भी आवश्यक हैं।
पवित्र ग्रंथों के 2-3 cross-references के संक्षिप्त स्पष्टीकरण
1) यिर्मयह 7:9-11 का संबंध इस वचन से यह दिखाता है कि धार्मिक क्रियाओं का बाहरी ढांचा तब तक ही मान्य है जब तक दिल-व्यवहार में परिवर्तन हो।
2) यिर्मयह 6:20 के साथ सम्बन्धित विचार यह है कि धूप-तपावन का पाठ्य ritual तब तक नहीं, जब तक सामने वाला अन्याय और पाप से मुक्त नहीं होता।
3) यशायह 1:17-18 से प्रेरणा मिलती है कि धर्म का मूल उद्देश्य व्यक्ति-जीवन में निष्ठा, न्याय और सहायता का व्यवहार है।
व्यावहारिक निष्कर्ष
हम अपने विश्वास के साथ-साथ रोजमर्रा की जिंदगी में भी ईमानदारी बनाए रखें। दिखावे की पूजा से बचें; जो मन्नतें की हों, उनकी सच्ची पूर्ति के लिए आचरण को भी संगत बनाएं, अन्यथा बहिर्गामी तर्पण भी व्यर्थ हो सकता है।
मुख्य विचार: आंतरिक समर्पण और बाहरी क्रिया में अंवार-समन्वय।
मुक्त के लिए एक छोटी सी स्मरण-योग्यता: अपने नियमों से नहीं, बल्कि सत्य-निष्ठा से चलना सर्वोपरि है।
ध्यान दें: इस पाठ के लिए मैथ्यू हेनरी, एल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के संकीर्ण उद्धरण यदि उपलब्ध हों, वे सुरक्षित रूप से केवल न्यूनतम संदर्भ के साथ ही उद्धृत होंगे।