Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
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लूका 20:14 — वचन का संक्षिप्त व्याख्या और संदर्भ
यह श्लोक यीशु के उस दृष्टान्त का हिस्सा है जिसमें एक जमींदार अपने अंगूरबाड़ी के लिए मजदूर भेजता है और बाद में अपने पुत्र को भेजता है। किसानों का उत्तर — पुत्र को मार डालने की योजना — पट्टाधारक ठगों और धार्मिक नेताओं की हृदयस्थितियों का प्रतीक है, जो परमेश्वर के दूतों और अंततः उसके पुत्र के प्रति विद्रोह और हिंसा दिखाते हैं।
मुख्य अर्थ
शास्त्रीय स्तर पर यह वचन तीन बातों को संकेत करता है: (1) वारिस का आगमन मालिकाना दावे और अधिकार का अंतिम प्रमाण है, (2) पुरुषों की लालच और स्वार्थी इच्छा उसे हटाने के लिए हिंसक योजना तक ले जाती है, और (3) यह भविष्यवाणी है कि परमेश्वर के पुत्र के प्रति विरोध, अपमान और अंततः क्रूरता होगी।
प्रमुख विषय
संबंधित शास्त्र और संक्षिप्त संबंध
यहाँ कुछ समान बिंदुओं से जुड़े पद जो समझ बढ़ाते हैं:
व्यावहारिक विचार
वर्तमान में यह वचन हमें आत्मनिरीक्षण की ओर बुलाता है: क्या हमारे जीवन में किसी भी प्रकार की स्वार्थपूर्ण लालसा है जो सत्य और न्याय के विरोध पर उतारू हो सकती है? पारिवारिक, धार्मिक या सामाजिक संदर्भों में जब किसी को "अंतिम अधिकार" या नया अधिकार स्वीकारना हो, तो हमारी प्रतिक्रिया प्रेम या स्वार्थ में से किसने प्रेरित की है, यह जाँचें।
विनीत समापन और टिप्पणियाँ
यह दृष्टान्त और विशेषकर लूका 20:14 स्पष्ट करता है कि परमेश्वर का संदेश और उसके प्रतिनिधियों के प्रति मानव प्रतिक्रिया अक्सर विरोध और हिंसा तक पहुँच सकती है। अंग्रेज़ी‑भाषी परम्पराओं में मैथ्यू हेनरी, अल्बर्ट बार्न्स और ऐडम क्लार्क जैसे पुरानी टीकाकारों ने सादृश्यों और नैतिक निष्कर्षों पर विस्तृत टिप्पणी की है; एक संक्षिप्त उद्धरण उल्लेखनीय है—मैथ्यू हेनरी का संक्षिप्त कथन: "the sending of the son was the last trial"—जो इस दृष्टान्त के निर्णायक चरण और बेटे के भेजे जाने के अर्थ को संक्षेप में पकड़ता है।
सारांशतः, लूका 20:14 न केवल एक कथा‑घटना है बल्कि यह मानव हृदय की गिरावट, स्वार्थ की भयंकरता और परमेश्वर‑केंद्रित अधिकार के विरोध की भविष्यवाणी है। इस वचन से हमें चेतना और विनम्रता सीखनी चाहिए ताकि हम स्वार्थ के स्थान पर ईमानदारी और न्याय को स्थान दें।