Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 20:1 लूका 20:2 लूका 20:3 लूका 20:4 लूका 20:5 लूका 20:6 लूका 20:7 लूका 20:8 लूका 20:9 लूका 20:10 लूका 20:11 लूका 20:12 लूका 20:13 लूका 20:14 लूका 20:15 लूका 20:16 लूका 20:17 लूका 20:18 लूका 20:19 लूका 20:20 लूका 20:21 लूका 20:22 लूका 20:23 लूका 20:24 लूका 20:25 लूका 20:26 लूका 20:27 लूका 20:28 लूका 20:29 लूका 20:30 लूका 20:31 लूका 20:32 लूका 20:33 लूका 20:34 लूका 20:35 लूका 20:36 लूका 20:37 लूका 20:38 लूका 20:39 लूका 20:40 लूका 20:41 लूका 20:42 लूका 20:43 लूका 20:44 लूका 20:45 लूका 20:46 लूका 20:47



सीधे अर्थ की घोषणा
लूका 20:35 में यीशु बताते हैं कि जो लोग इस योग्य ठहरते हैं, उन्हें मरे हुओं में से जी उठने का अधिकार मिलेगा, और तब विवाह-शादी उनकी प्रकृति में नहीं रहेगी। इसका मतलब है कि पुनर्जन्म और दिव्य जीवन के भविष्य के समय में पारंपरिक सांसारिक संस्थाओं की भूमिका सीमित होगी, क्योंकि वहाँ पूर्ण शरण और ईश्वर के सामर्थ्य के साथ जीवन में प्रवेश होगा।
पृष्ठभूमि समझना
यह पाठ शास्त्र-संवाद के क्रम में आता है जब पेचीदा प्रश्न उठते हैं कि मरे हुओं में से उठना क्या होता है और कितनी परिस्थितियों में पुनर्जन्म की अनुभूति संभव है। यीशु का उत्तर विवाह-शादी जैसे सामाजिक संस्थानों की नैतिक और अस्थायी nature को बताने वाला है; वह जीवन के शाश्वत और आध्यात्मिक पहलुओं पर केन्द्रित है।
व्याख्यात्मक बिंदु
संवेदनशील पाठ-नोट्स
नीति-भ्रामक दार्शनिक प्रश्नों के बजाय यहाँ यीशु ईश्वर के राज्य की वास्तविकता पर प्रकाश डालते हैं: वहां सामाजिक क्रियाओं का अर्थ स्थिर रहता है, परन्तु पारलौकिक जीवन में वर्तमान रिश्तों की भूमिका नितांत बदल जाती है।
संबद्ध आयत-आख्यान
मुख्य विचार: पुनर्जन्म, जीवन का स्थायी स्वरूप, और ईश्वर के साथ अनन्त संबंध। नीचे के संदर्भ विचार इस दिशा को समझने में मदद करते हैं:
त्वरित निष्कर्ष और praktiक मार्गदर्शक
हम इस पाठ से सीखते हैं कि परमेश्वर के राज्य में प्रवेश के लिए आस्था और योग्यताएँ चाहिए; पृथ्वी के रिश्ते चाहे कितने भी महत्वपूर्ण हों, वहाँ जीवन की परिभाषा अधिक व्यापक और दिव्य है। आत्म-लग्नता और नैतिक दृढ़ता के साथ जीवन बिताएं ताकि भविष्य के जीवन में ईश्वर के साथ गहरे संबंध स्थापित हों।
अन्य संदर्भ और संक्षेप व्याख्या
1) मर मिटना और पुनर्जन्म पर विचार: यीशु पुराने नियम-धारणा को नवीन रोशनी में प्रस्तुत करते हैं, जहां सत्ता और शासन परमेश्वर के हाथों में है।
2) निष्कर्ष-परिवर्तन: विवाह-शादी जैसे संस्थान क्षणिक हैं; ईश्वर के राज्य में आत्म-परिवर्तन स्थायी है।
3) दायित्व और आशा: योग्य बनना विश्वास-कार्य का परिणाम है; यह जीवन के भीतर कर्मों और आस्थाओं के संतुलन से आता है।
कहानी-उद्धरण स्रोत: Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक डोमेन टिप्पणीकारियों से समेकित बोध और संरचना के भीतर उनके छोटे-छोटे सुंदर विचार यहाँ संक्षिप्त रूप में समाहित किए गए हैं।