Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 20:1 लूका 20:2 लूका 20:3 लूका 20:4 लूका 20:5 लूका 20:6 लूका 20:7 लूका 20:8 लूका 20:9 लूका 20:10 लूका 20:11 लूका 20:12 लूका 20:13 लूका 20:14 लूका 20:15 लूका 20:16 लूका 20:17 लूका 20:18 लूका 20:19 लूका 20:20 लूका 20:21 लूका 20:22 लूका 20:23 लूका 20:24 लूका 20:25 लूका 20:26 लूका 20:27 लूका 20:28 लूका 20:29 लूका 20:30 लूका 20:31 लूका 20:32 लूका 20:33 लूका 20:34 लूका 20:35 लूका 20:36 लूका 20:37 लूका 20:38 लूका 20:39 लूका 20:40 लूका 20:41 लूका 20:42 लूका 20:43 लूका 20:44 लूका 20:45 लूका 20:46 लूका 20:47
पाठ अवलोकन
ल्यूका 20:31 में मसीह के शिक्षण के क्रम के साथ संदिग्धता और उद्धार की दृष्टि से एक दृश्य प्रस्तुत होता है। यहाँ शब्दचित्र यह दिखाता है कि जहाँ विधि-नियमों के भीतर लोग पुनरावृत्ति के इंतज़ार में रहे, वहीं यीशु यह स्पष्ट करते हैं कि दैवीय योजना में जीवन के लिए एक अद्भुत क्रम चलता है—परिणामस्वरूप जीवन और मृत्यु के प्रश्न भी क्रमशः नज़र आते हैं। इस पद में सात विवाहित स्त्रियाँ और उनके बाय-विवाह का उल्लेख है, जो तलाक, पुनर्विवाह और संतान-हीनता के सामाजिक-धार्मिक दबावों को दर्शाता है।
पद का संदर्भ और पाठ
यह वाक्या लूका के ग़ुलामों के एक समाज में विवाह-जीवन और पुनर्विवाह की रीति-नीति से जुड़ा है, जहाँ एक स्त्री की सात पतियों के साथ विवाह-कालक्रम का वर्णन है। यह कथा ग्रीक-भाषा के पाठों में चलन में रहा है और यीशु के उत्तर से यह स्पष्ट होता है कि जीवन के परम सांत्वना और पुनर्जीवन के सिद्धांत यहाँ सामाजिक-धर्मी कल्पनाओं से ऊपर उठकर परम सत्ता के बारे में है।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
इस verse का मूल पाठ यह संकेत देता है कि धार्मिक नियमों के भीतर जीवन की वास्तविक सुरक्षा और उत्तरदायित्व से आगे एक दिव्य सत्ता है, जो सब कुछ क्रमबद्ध करती है। सातों पति-करण की कहानी हमें यह समझाती है कि पृथ्वी पर मानवीय योजना कितनी भी मजबूत हो, ईश्वर के राज्य में जीवन के बंधन और पुनर्जीवन की दृष्टि हार्दिक विश्वास और उद्धार के नियमों से संचालित होती है।
अनुदेशात्मक बिंदु—दृष्टिकोण
अन्य बाइबल पाठों से संबद्धता
1) मरकूस 12:25 और मत्यु 22:30 जैसी प्रत्यक्ष टिप्पणियाँ यह संकेत देती हैं कि स्वर्ग में मृत्यु के बाद जीवन के दायरे में विवाह की भूमिका भिन्न हो सकती है, और परमेश्वर के राज्य के सिद्धान्त स्थिर रहते हैं।
2) जबकि रोम 8:38-39 में प्रेम-उद्धार की असीम पहुँच का उल्लेख है, लूका 20:36 में दिव्यता के सामने जीवन का क्रम और मृत्यु का निर्णायक महत्त्व आत्म-विश्वास पैदा करते हैं।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
हमारी सांसारिक परम्पराएं कभी-कभी जीवन की अस्थिरताओं के कारण तनाव उत्पन्न करती हैं। इस पद से प्रेरणा मिलती है कि परमेश्वर के राज्य में वास्तविक सुरक्षा और शांति आस्था पर निर्भर है, न कि केवल सामाजिक-वैधानिक चेन पर। व्यक्तिगत जीवन में, हम ईश्वर की souverain शक्ति पर भरोसा रखें और अपने भागीदारी-सम्बन्धों को भी उसी मानक के अनुसार जीने का प्रयास करें।
संक्षेप
इस उद्धरण में सात पतियों के द्वारा एक स्त्री के विवाह-क्रम की कथा से यह संदेश निकलता है कि ईश्वर के राज्य में जीवन की सत्ता पृथ्वी के नियमों से परे है। यह हमारे लिए आश्वस्त करता है कि उद्धार की खोज में परमेश्वर की योजना और मातृत्व-स्वरूप जीवन का सम्मान सर्वोपरि है, न कि मानव-निर्मित धाराओं के अनुसार।
पूर्व-प्रेरणा उद्धरण (नोट)
यदि आप Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के संकलनों से समान शब्द-समर्थन चाहते हैं, नीचे संक्षेप में संकेत दिए जाते हैं:
• Matthew Henry: “...’’
• Albert Barnes: “...’’
• Adam Clarke: “...’’
इन उद्धरणों के वास्तविक वाक्यों का पूर्ण टेक्सट ici नहीं है, पर उनके विचार नीचे दिए गए सामान्य निष्कर्षों में समाहित हैं।
क्रॉस-रेफरेंसेस
1) मरकुस 12:25—स्वर्गीय जीवन में परस्पर विवाह की भूमिका के परे जीवन की वास्तविकता समझना चाहिए।
2) मत्ती 22:30—स्वर्गीय जीवन में पुनर्जन्म और विवाह के स्वरूप का दर्शन।
3) रोम 8:38-39—प्रकाशित प्रेम और परम प्रेम की असीम शक्ति से जीवन की सुरक्षा।