लूका 20:33 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

अतः जी उठने पर वह उनमें से किस की पत्‍नी होगी, क्योंकि वह सातों की पत्‍नी रह चुकी थी।”

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लूका 20:33 पद-दर-पद बाइबल टीका

मुख्य व्याख्या सार

लूका 20:33 में Jesus प्रत्यक्ष रूप से एक प्रश्न का उत्तर नहीं देते, बल्कि यह दिखाते हैं कि दिव्य जीवन के वास्तविक स्वरूप और इस्तीफे के साथ मरहम की आवश्यकता है। प्रश्न यह है कि शरीर के फिर से उठने पर किसकी पत्नी होगी, क्योंकि सातों ने एक-एक पति-पत्नी बनी थीं; यह कथन बानगी देता है कि पृथ्वी-जीवन की सामाजिक विवाह व्यवस्था अगले जीवन में भी अपने स्वरूप में बदल नहीं जाती, बल्कि परम जीवन की वास्तविकता पूर्णता और नया अवस्था है। यह passage उस समय की समाज-परंपरा को संबोधित करता है जहाँ पुनर्जीवन के बारे में यहूदियों के बीच धारणाएं प्रचलित थीं। यीशु का उत्तर इस बात को स्पष्ट करता है कि पुनर्जीवन में जीवन नई प्रकृति, नई स्थितियों और परमेश्वर की सत्ता के अधीन होता है; वहाँ न विवाह-बंधन चलेगा, न जीवन की सीमाओं का वही अर्थ रहेगा जो पृथ्वी पर है।

आख्यानिक संदर्भ ( literary context )

यह पाठ लूका के Gospel में वे शब्द हैं जो धार्मिक नेताओं के प्रश्नों के क्रम में आते हैं—जो resurrection, life after death और समर्पण के गहरे प्रश्न पूछते हैं। लूका 20 के शास्त्री-फारिसियों के सवालों के बीच यीशु मृत्यु और जीवन के वास्तविक क्रायोटेरिया को सामने रखते हैं। यहाँ कथा का प्रमुख सेटिंग यह है कि दिव्य व्यवस्था में जीवन की कसौटी प्रेम, विश्वास और परमेश्वर के नियमों के अनुरूप है, न कि प्रथा के कारण।

गंभीर theological संकेत

पुनर्जीवन के संदर्भ में यीशु यह संकेत करते हैं कि जीवन का स्वरूप और सामाजिक संरचना इस पृथ्वी के दायरे से बाहर निकलकर परम प्रभु के साथ एक दूसरे स्थान पर है। यहाँ जवाब यह है कि दूसरे जीवन में प्रकृति-परिवर्तन होता है: विवाह-बंधन, परिवार की भूमिका आदि अब समीचीन नहीं रहते। यह शायद यह भी सिद्ध करता है कि परमजीवन का लक्ष्य नयी criatura के रूप में परमेश्वर की उपस्थिति और सहभागिता है।

पवित्रशास्त्र में cross-references

  • मरकस 12:25 — आत्मा-जीवन के लिए पृथ्वी-सम्बन्धों की सीमाओं से ऊपर उठना। यह बताता है कि पुनर्जीवन में रिश्तों की परंपरागत संरचना नहीं चलेगी।
  • यूहन्ना 11:25-26 — मैं है जीवता और जो मुझ पर विश्वास करेगा, उसे मरण नहीं और न ही जीवन का अंत; यह जीवन की नई अवस्था को मान्य करता है।
  • रोमियों 6:4 — हम प baptized into Christ's death, ताकि जैसे धीरे-धीरे वह जीवन में जी उठे, वैसे ही हम भी नयेपन में चलें।

इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि पुनर्जीवन में पुरानी सांसारिक व्यवस्थाओं की सीमाओं का अंत होता है, और परमात्मा की नई जीवन-स्थिति खुलती है।

विचार-विमर्श के प्रश्न

  • पुनर्जीवन के बारे में मैं कौन सी धारणाओं को किन कारणों से लेकर चलता/चलती हूँ?
  • क्या मेरे विचार परमेश्वर के प्रकटीकरण की सार्वभौमिक सत्ता पर टिके हैं, न कि केवल पृथ्वी-जीवन की सामाजिक संरचनाओं पर?
  • मैं किस प्रकार की जीवन-परक आस्था से दिव्य जीवन के साथ सहभागिता सुनिश्चित कर सकता/सकती हूँ?

संक्षिप्त निष्कर्ष

इस पाठ से सीख मिलती है कि पुनर्जीवन का जीवन वर्तमान के रिश्तों से परे है और परमेश्वर की सरकार के भीतर एक नयी प्रकृति से शुरू होता है। यीशु यह दर्शाते हैं कि मरने के बाद की जीवन-स्थितियाँ मानवीय व्यवस्थाओं से ऊपर उठती हैं; असल लक्ष्य ईश्वर के साथ अटूट जीवन है।

नोट: इस commentary में नीचे दिए गए 3 प्रसिद्ध पब्लिक डोमेन टिप्पणीकारों के छोटे उद्धरण अगर उपलब्ध हों, उन्हें संक्षेप में ही उद्धृत किया गया है।

मैथ्यू हेनरी से बोधपूर्ण छोटे वाक्य: “...”— (यदि उपलब्धता हो)

एलबर्ट बार्न्स से बोधपूर्ण छोटे वाक्य: “...”— (यदि उपलब्धता हो)

एडम क्लार्क से बोधपूर्ण छोटे वाक्य: “...”— (यदि उपलब्धता हो)

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

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“हे गुरु, मूसा ने कहा था, कि यदि कोई बिना सन्तान मर जाए, तो उसका भाई उसकी पत्‍नी को विवाह करके अपने भाई के लिये वंश उत्‍पन्‍न करे।

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मरकुस 12:19 (HINIRV) »
“हे गुरु, मूसा ने हमारे लिये लिखा है, कि यदि किसी का भाई बिना सन्तान मर जाए, और उसकी पत्‍नी रह जाए, तो उसका भाई उसकी पत्‍नी से विवाह कर ले और अपने भाई के लिये वंश उत्‍पन्‍न करे। (उत्प. 38:8, व्य. 25:5)

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