Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
लूका 20:1 लूका 20:2 लूका 20:3 लूका 20:4 लूका 20:5 लूका 20:6 लूका 20:7 लूका 20:8 लूका 20:9 लूका 20:10 लूका 20:11 लूका 20:12 लूका 20:13 लूका 20:14 लूका 20:15 लूका 20:16 लूका 20:17 लूका 20:18 लूका 20:19 लूका 20:20 लूका 20:21 लूका 20:22 लूका 20:23 लूका 20:24 लूका 20:25 लूका 20:26 लूका 20:27 लूका 20:28 लूका 20:29 लूका 20:30 लूका 20:31 लूका 20:32 लूका 20:33 लूका 20:34 लूका 20:35 लूका 20:36 लूका 20:37 लूका 20:38 लूका 20:39 लूका 20:40 लूका 20:41 लूका 20:42 लूका 20:43 लूका 20:44 लूका 20:45 लूका 20:46 लूका 20:47



अर्थ का सीधा बयान
यूहन्ना 20:13 के समान लूका 20:13 में दाख की बारी के स्वामी ने परमेश्वर की ओर से एक ऐतिहासिक दृष्टांत दिया है जिसमें मालिक पूछता है कि वह क्या करे: वह अपने प्रिय पुत्र को भेजेगा, ताकि लोग उसका आदर करें। यह कथन अतिशय प्रतीक है कि परमेश्वर अपनी ही लगती प्राथमिकताओं और पवित्र संदेश की मान्यता के लिए किसी प्रतिनिधि को भेजना चाहते हैं, परन्तु मानव-उत्पादन में प्रतिरोध दिखता है, और परिणामस्वरूप उद्धार का अवसर खतरे में पड़ सकता है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यह पैराग्राफ यूँ तो एक कहानी के रूप में एक दाख की बारी के मालिक के बारे में है, पर इसका उद्देश्य यह दिखाना है कि ईश्वर के मालिकाना ढांचे में prophets, संदेशवाहक और अंततः उनका पुत्र—यésus—कब और कैसे मान्य किया जाएगा। लूका के लेखक ने यह स्पष्ट किया है कि परमेश्वर ने अपने प्रकार-नियमों के अनुसार अपने संदेशवाहकों को भेजा, परन्तु जनसमुदाय की अवहेलना के कारण वे ठगाए जाते हैं।
व्याख्यात्मक टिप्पणियाँ
क्रॉस-रेफरेंस और उनके तात्पर्य
यशायाह 5:2 में दाख की बारी के मालिक का संकेत मिलता है कि परमेश्वर अपने लोगों में प्रेम के साथ कार्य करते हैं, फिर भी वे संतोषजनक परिणाम नहीं देते।
मरकुस 12:1-9 में उसी प्रकार के प्रतीक में किरायेदारों का उदाहरण दिया गया है, जो संदेशवाहकों को मारते हैं—यानी यह कथा दुनिया की आधिपत्य और देवत्व के प्रश्न को उजागर करती है।
यूहन्ना 1:11 में कहा गया कि वह अपने ही लोगों ने उसे ग्रहण नहीं किया—यह प्रभु के व्यक्तित्व और उद्धार की अस्वीकृति को दिखाता है।
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि दाता परमेश्वर अपने संदेशवाहकों के माध्यम से संदेश भेजता है, किंतु मानव स्वार्थ और अवहेलना कभी-कभी उस दिव्य योजना में बाधक बनती है।
एक संक्षिप्त थीमैटिक सूची
संक्षिप्त निष्कर्ष और व्यावहारिक Takeaway
हम देखते हैं कि परमेश्वर अपनी योजनाओं को लगातार चलते रहते हैं, भले ही इंसान उनकी मान्यता से चूक जाए। विश्वास के साथ संदेश स्वीकारना और ईश्वर की बुद्धि पर निर्भर रहना चाहिये, न कि अपनेपन के कारण अवरोध डालना। व्यक्तिगत जीवन में इसका सीख यह है कि ईश्वर के मार्ग पर सचेत रहें, उनके भेजे संदेशों को आदर दें, और धैर्य के साथ उनके समय-सूत्र पर भरोसा रखें।
फुटनोट: इस पाठ से जुड़े कुछ शब्द Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के मौलिक टिप्पणियों के समन्वय से मोड़ते हैं, परन्तु यहाँ उनके स्पष्ट उद्धरण सीधे नहीं दिए गए हैं; यदि चाहें तो मैं उन्हें संक्षेप में हिंदी में समाहित कर दूँ।