Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
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सीधे दिये गए अर्थ का सार
यूहन्ना के भविष्यवक्ता होने की मान्यता परपाँच में एक आशंका भरी बात है। यदि लोग कहें कि यह शब्द मानव-यात्रा से नहीं आया, बल्कि परमेश्वर के प्रेरित व्यक्ति के माध्यम से आया है, तो भी वे सच मानते हैं कि यूहन्ना भविष्यदक्ता थे; परन्तु तब भी समाज इसे स्वीकार नहीं करेगा और पत्थराव की धमकी दे सकता है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यह उद्धरण लूका 20 में पतरस के विरोधाभास के समय के आसपास आता है, जहाँ राजनीतिक और धार्मिक नेता यीशु के बारे में पूछताछ कर रहे हैं और सच को लेकर भ्रमित हैं। यह भाव यह दर्शाता है कि लोग सच को स्वीकार नहीं करना चाहते, भले ही वही सत्य परमेश्वर की योजना का हिस्सा हो। यूहन्ना भविष्यदक्ता होने की बातें इस बात का संकेत देती हैं कि लोगों के भीतर अतीत के विश्वास का स्मरण और चेतावनी का संदेश था, जिसे वे मानना नहीं चाहते थे।
interpretive observations
थीमेटिक बिंदु
क्रॉस-रेफरेंसेस (संकेतित व्याख्या के साथ)
1) मत्ती 23:34-35 - धार्मिक नेताओं के बीच सच बताने वाले भविष्यद्वक्ताओं की भूमिका का प्रतिफल दिखता है; विरोध के बावजूद सत्य का संदेश जारी रहता है।
2) मरकुस 6:14-16 - यूहन्ना के भविष्यदक्ता होने का स्मरण कराते हैं; लोग उसे नहीं मानते और मज़ाक बनाते हैं, फिर भी उसकी पहचान स्पष्ट रहती है।
3) मसीही भक्ति में ईश्वर की योजना के अनुसार सत्य खुलता है, भले ही लोगों के विचार उसे अस्वीकार करें।
संक्षिप्त व्यवहारिक takeaway
जब सत्य ठहरता है, उसे डर या सामाजिक दबाव के बावजूद स्वीकारना चाहिए; भिन्न मत के बावजूद ईश्वर के संकेतों को पहचानना और साहसपूर्वक उनका पालन करना चाहिए।
नोट: इस चर्चा में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के स्पष्ट उद्धरण आवश्यक्तानुसार केवल संक्षेप में प्रयुक्त हुए हैं। उनके विचार: सत्य को समझना और उसे समाज के दबाव के बावजूद स्वीकारना, भविष्यद्वक्ताओं के संदेश की महत्ता को उजागर करना, इस प्रकार के संदेशों के भीतर ईश्वर की व्यवस्था की पुष्टि करते हैं।