Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
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परन्तु किसानों ने पुत्र को देखकर आपस में कहा, ‘यह तो वारिस है, आओ, उसे मार डालें: और उसकी विरासत ले लें।’ (मत्ती 21:38)
परिस्थिति का तुरंत परिचय: यीशु ने मिस्र-देश से विगत पाथर वाले दत्तक-प्रकार की कथा के साथ शहरी किसानों केृत्य का उदाहरण सुनाते हुए अपना कथन प्रस्तुत किया था। यहाँ किसान एक हीरे-से भरे खेत के मालिक होने के नाते, विरासत के अधिकार के लिए पुत्र को भी खतरे में डालते हैं। यह टिप्पणी उनके हृदय के कठोरपन, स्वार्थ और अधिकार-लालच को उद्घाटित करती है।
ईश्वर के बारे में पाठ से मिलने वाला संदेश
यह वाक्य इस बात की गवाही देता है कि मानव का स्वार्थ परिमार्जन नहीं कर सकता; परन्तु परमेश्वर की योजना में, प्रभु यीशु स्वयं उस विरासत की प्रतिमा हैं—जो पाप के कारण खो गई थी और जिसे लौटाने के लिए परमेश्वर ने अपने पुत्र को भेजा। किसानों की यह प्रतिक्रिया घोषणा करती है कि नयापन और उद्धार लेने की आवश्यकता मात्र यीशु के कारण संभव है। यह दृश्य न केवल गैर-धर्मों के प्रति उग्रता को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि मानव-स्वार्थ परमेश्वर के उद्देश्य के विरुद्ध खड़ा रहता है जब तक वह ईमानदार आज्ञाओं की ओर लौटे नहीं।
महत्वपूर्ण शब्दों/चित्रों की व्याख्या
अन्य सुसमाचारों के संदर्भ
1) यूँ ही एक समान चेतावनी और पारित होने की कथा—खेत के मालिक के पुत्र को मार डालना—यह संकेत देता है कि परमेश्वर के राज के लिए मानव- असफलता कितनी गहरी है।
2) प्रायः: प्रजा और धार्मिक नेताओं के साथ यीशु की टकराहट में भी यही विचार आता है कि यीशु उनके द्वारा अस्वीकार किया जा सकता है।
3) अतीत के संदर्भ: नबी-युग के विजयी उद्धारकर्ता के रूप में आती हुई योजना और फिर से पुनर्स्थापना की आशा इस कथा में निर्बद्ध है।
आज का आवेदन
हमारे जीवन में विरासत—जो परमेश्वर की कृपा से मिलती है—को कैसे स्वीकारते हैं? यह पाठ हमें चेतावनी देता है कि मानव स्वार्थ कभी-कभी ईश्वरीय बुलाहट को रोक दे सकता है। यीशु की आने वाली कुर्बानी और पुनर्जीवन का संदर्भ स्मरण कर, अपने जीवन की प्राथमिकताओं को परमेश्वर के राज के अनुरूप ढालें: प्रति-दिन विश्वास में कदम आगे बढ़ाएं, न कि अपने अधिकारों के लिए ईष्या-युक्त कदम उठाएं।
प्रमुख क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप)
- कुरिन्थियों 1:18-24: परमेश्वर की कुँवी और मसीह की क्रूस के संदेश का प्रत्यक्ष उद्देश्य, जीवित विश्वास के लिए उद्धार का संदेश।
- मत्ती 21:33-41 (पश्चात्ताप-आह्वान): मालिक और बेटों के बीच का संघर्ष, और प्रभु के राज के लिए अस्वीकारण की प्रतिक्रिया।
- मरकुस 12:1-12: किसानों की कथा का समांतर रूप, जो यह बताता है कि ईश्वर का राज्य मानव-उच्चारण के विरुद्ध है और उद्धारकर्ता की अवहेलना का परिणाम क्या होता है।
महत्वपूर्ण संदर्भ-योग
इन क्रॉस-रेफरेंसेस से स्पष्ट होता है कि परमेश्वर के राज्य के लिए ईश्वर का पुत्र एक केंद्रीय केन्द्र है, और मानव- स्वार्थ उसे मार डालने की सोच कैसे प्रत्यक्षतः प्रभु-कार्य को चुनौती देती है।
संक्षेप: यह वाक्य हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर की विरासत—यानी उद्धार और नया जन्म—के लिए प्रभु यीशु का आदेश और उनकी मृत्यु-जीवन-जीत का क्रम अनिवार्य है। हमारे लिए आवश्यक है कि हम अपने दिलों को खोलकर प्रभु के आह्वान को स्वीकार करें और स्वार्थी लालच से बचते हुए ईश्वर के राज्य के साथ सहभागिता बनाएं।